आज से सावन शुरू हो गया है। ऐसे में हम आपको बता रहे हैं महादेव और उनकी पत्नी आदिशक्ति की प्रेम कहानी। आदिशक्ति ने बार बार जन्म लिया और हर जन्म में महादेव की पत्नी बनीं। दक्ष प्रजापति के कई सुन्दर और सुशील पुत्रियां थीं। परन्तु वो एक सर्व शक्ति संपन्न, सर्वत्र विजयिनी पुत्री की चाहत रखते थे।

जो गुणवती, रूपवती , वीरांगना, दयावान आदि सभी गुण से परिपूर्ण हों। अपितु ऐसी पुत्री की प्राप्ति के लिए उन्होंने तपस्या प्रारम्भ कर दिए। बहुत दिनों के कठिन तपस्या के पश्चात भगवती आद्या प्रकट हुई। भगवती बोली मैं तुम्हारे तप से प्रसन्न हुई दक्ष। मैं स्वयं तुम्हारे घर पुत्री के रूप में जन्म लुंगी।मेरा नाम सती होगा और मैं अपनी लीलाओं को संसार में आगे बढ़ाउंगी। फलतः दक्ष के घर अलौकिक पुत्री का जन्म हुआ। जो सती कहलायीं। सती की बाल्यकाल में कारनामे देख कर स्वयं पिता दक्ष भी आश्चर्यचकित हो जाते थे।

सती जब विवाह योग्य हुईं, तब पिता को पुत्री की विवाह की चिंता सताने लगी। उन्होंने ब्रह्मा जी के पास जाकर अपनी चिंता प्रकट की। ब्रह्मा बोले सती तो साक्षात आद्या की अवतार हैं। आद्या आदिशक्ति जगदम्बा हैं और महादेव आदि पुरुष जगत पिता हैं। अतएव शिव जी ही सती के लिए योग्य वर हो सकते हैं। दक्ष, ब्रह्मा जी के कहा अनुसार सती का विवाह त्रिलोक के स्वामी भगवान शिव के साथ कर दिया। सती और शिव कैलास में ख़ुशी पूर्वक रहने लगे।

एक बार ब्रह्मा जी ने धर्म की विवेचना करने के लिए सभा का आयोजन किया। सभी देवता सभास्थल पर एकत्रित थे। भगवान शिव भी सभा में उयस्थित थे। सभा स्थल में जब दक्ष का आगमन हुआ तो सभी देवता खड़ा होकर अभिनन्दन किया। परन्तु शिव बैठे रह गए और दक्ष को प्रणाम भी नहीं किये। दक्ष को इससे बहुत बड़ा अपमान का अनुभव हुआ। और वह इसकी बदला लेने की ठान ली। भगवान सदाशिव समदर्शी हैं। वो समस्त चराचर को एक दृष्टि से देखते हैं। उनको किसी के मान अपमान से क्या फर्क पड़ता है। वो तो जग की रक्षा लिए स्वयं विषपान कर लेते हैं।

कुछ दिनों बाद दक्ष कनखल में एक यज्ञ का आयोजन किया। उन्होंने यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए समस्त देवी-देवताओं और ऋषि-मुनियों को आमंत्रित किया था। किन्तु भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया गया। वह शिव को अपमानित करना चाहते थे।

एक दिन सती और भगवान शिव कैलाश पर्वत पर बैठकर वार्तालाप कर रहे थे। उसी समय आकाश में कई पुष्पक विमान कनखल कि ओर जाते हुए दिखाई पड़े। सती ने भगवान शिव से पूछा – प्रभो, इतने पुष्पक विमान किसके है और एक साथ कहां जा रहे हैं?

भगवान बोले – आपके पिता यज्ञ कर रहे हैं। समस्त देवी देवता यज्ञ में हिस्सा लेने इस पुष्पक विमान से जा रहे हैं। सती फिर पूछा – क्या पिता जी आपको आमंत्रित नहीं किये हैं ? भगवन शिव उत्तर दिये – आपके पिता को मुझ से द्वेष है। इसलिए वो हमें भला क्यों आमंत्रित करेंगे ? सती मन में कुछ विचार कर बोलीं – यज्ञ में हमारी सभी बहनें आएंगी। उनसे मिलने को मेरा मन बहुत आतुर है। अतः हे प्रभो अगर आप अनुमति दें तो मैं भी अपने पिता घर जाना चाहूंगी। यज्ञ के साथ-साथ बहनों से भी मिल लुंगी। भगवान शिव बोले – हे सती, इस समय जाना उचित नहीं है। आपके पिता मुझसे विद्वेष रखते है ,आपका भी अपमान कर सकते हैं। बिना बुलाए जाना उचित नहीं है। परन्तु सती के जिद्द करने पर शिव ने जाने की अनुमति दे दी। साथ ही अपने सेवक वीरभद्र को भी साथ में भेजा।
सती को पिता के यहाँ कनखल पहुँच कर वैसा ही अपमान का सामना करना परा जैसा भगवान शिव ने कहा था। दक्ष ने सती को देख बोला यहाँ क्यों आयी हो ? मेरा अपमान हो रहा है। तुम अपनी बहनों के बस्त्र और आभूषण देखो। तुम यहाँ बाघम्बर पहन के आयी हो। तुम्हारे पति श्मशान में भूतों के देवता हैं। वह तुम्हें बाघम्बर के अलावा क्या दे सकते हैं। दक्ष के अपमान से सती को बहुत पश्चाताप हुआ। उन्हें लगा कि वो यहाँ आकर ठीक नहीं किया। भगवान ठीक कह रहे थे बिना बुलाये नहीं जाना चाहिए। पर अब क्या करें ? अब तो आ गई हूं। इस प्रकार वो मौन हो कर अपने पिता का अपमान सहते हुए यज्ञ कुंड तक गयी । धू-धू करती जलती हुई यज्ञ कुंड में आहुतियां डाली जा रहे थे।

सती ने देखा – अरे यह क्या! यज्ञ मंडप में सभी देवताओं के अपने-अपने भाग हैं, पर भगवन शिव का भाग तो है ही नहीं। इसका कारण सती ने अपने पिता दक्ष से पूछा। दक्ष बड़े ही अभिमान से उत्तर दिया – तुम्हारा पति शिव देवता नहीं अपितु भूतों के स्वामी हैं। नग्न रहने वाला है। हड्डियों का हार धारण करता है। वह देवता के बिच रहने लायक नहीं है।

सती पिता के मुख से अपने पति भगवान शिव का अपमान सहन नहीं कर सकी। क्रोधावेश से मुखमण्डल लाल हो गया। वह तिलमिला उठीं। ओह धिक्कार है मुझ पर कैसे सुन रही हूँ ये सब। हे देवगण आप कैसे सहन कर रहे हैं त्रिपुरारी के लिए ये शब्द। कैलाशपति तो सम्पूर्ण सृष्टि के देवता हैं वो त्रिलोक के स्वामी हैं। उनमे इतनी शक्ति है कि क्षण में सृष्टि का विनाश कर सकते हैं। वे मेरे स्वामी हैं। पिता द्वारा अपने स्वामी का अपमान सह कर जिन्दा नहीं रह सकती। ऐसा कहते हुए सती यज्ञ कुंड में कूद पड़ी और अपने प्राण की आहुति दे दी। यह देख यज्ञ शाला में हाहाकर मच गया। देवगण उठ कर खरे हो गए। ऋषि मुनि भागने लगे। वीरभद्र क्रोध से कांपने लगा। यज्ञस्थल पर भगदड़ मच गई। वीरभद्र ने दक्ष का मस्तक काट दिया। तीनों लोकों में सती की आहुति खबर फैल गई। खबर जैसे ही शिवजी के कानों में गई। भोलेनाथ प्रचंड रूप धारण कर कनखल पहुंचे।

सती की अधजली शरीर को देख सब कुछ भूल गए। अपने विकराल रूप में आ गए। सती के प्रेम और भक्ति ने शंकर मन को भी व्याकुल कर दिया। उस मन को जिन्होंने काम पर भी विजय प्राप्त की थी और जो सम्पूर्ण सृष्टि को विनाश करने की क्षमता रखते थे। भगवान सती की अधजली शरीर को अपने कंधे पर रखकर तांडव करने लगे। सम्पूर्ण संसार त्राहि त्राहि करने लगा। हवाएं थम्ह गयी। पृथ्वी रुक गयी। संपूर्ण जीव जंतु व्याकुल हो उठे। यह देख भगवान विष्णु आगे आये। और शिव शंकर के बेसुधि में सती के प्रत्येक अंग काट कर कन्धों से गिरा दिए। संपूर्ण शरीर कट कर गिरने के बाद शिव शांत हुए। फिर पुनः सृष्टि भली भांति चलने लगी। पृथ्वी पर जिन इक्यावन (51 ) स्थलों पर सती के अंग गिरे थे वे आज शक्ति पीठ के नाम से जाना जाता है। वहां आज सती का पूजा अर्चना किया जाता है। महान प्रेम था शिव और सती का।

Sources:-Live News

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