लोकसंवाद कार्यक्रम रद्द, नीतीश की खामोशी तूफान से पहले की शांति तो नहीं…

राजनीति

बिहार में राजनीतिक संकट के हालात हैं। डिप्टी सीएम पर भ्रष्टाचार का मामला दर्ज होने के बाद अब सबकी निगाहें सीएम नीतीश पर ठहर गयीं हैं। नीतीश ने चुप्पी साध रखी है। ऐसे में सभी दल वेट एंड वाच की स्थिति में हैं। सभी दल बैठक-बैठक खेल रहे हैं। बिहार के राजनीतिक हालात पर भाजपा की नजर है। उसकी बैठक हो चुकी है। कल राजद की बैठक होने वाली है। जदयू के नेताओं की भी जुटान होना ही है।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार किसी गहरे कश्मकश में हैं। राजगीर से लौटने के बाद भी नीतीश कुमार ने लालू परिवार के खिलाफ छापेमारी पर कुछ नहीं कहा। इस बीच सोमवार को होने वाले लोकसंवाद कार्यक्रम को रद्द कर दिया गया है।

इस कार्यक्रम के रद्द होने का कारण नीतीश का अस्वस्थ होना बताया जा रहा है। लेकिन सवाल ये है कि जब नीतीश की तबीयत ठीक नहीं हुई थी तो वे राजगीर से पटना आये ही क्यों ? वे तो वहां स्वास्थ्य लाभ करने गये थे। यानी नीतीश के मन में कोई न कोई भेद जरूर है। उन्हें मालूम था कि लोकसंवाद कार्यक्रम में मीडिया लालू यादव से जुड़े सवाल जरूर पूछेगी। तब उन्हें या तो सवाल को टालना होगा या फिर जवाब से इंकार करना होगा। दोनों की स्थिति उनके लिए असहज होगी। नीतीश अभी मीडिया से दूरी बनाये रखना चाहते हैं। इस लिए उन्होंने सेहत के बहाने इसे रद्द कर दिया। नीतीश तब मीडिया के सामने आना चाहते हैं जब उनके पास कोई जवाब हो।

राजद की तरफ से साफ कर दिया गया है कि तेजस्वी यादव इस्तीफा नहीं देंगे। ऐसे में नीतीश के लिए फैसला लेना आसान नहीं है। कहा जा रहा है कि सोमवार की बैठक में राजद तेजस्वी यादव के समर्थन में कोई प्रस्ताव पारित कर सकता है। महागठबंधन की सरकार में राजद का संख्याबल जदयू से अधिक है। इस लिए राजद शक्ति प्रदर्शन के लिए इस बैठक को जरिया बना सकता है।
नीतीश इसके पहले दो मौकों पर विवादित मंत्रियों से इस्तीफा ले चुके हैं। 2005 में सरकार बनने के चार घंटे बाद ही जीतन राम मांझी से इस्तीफा ले लिया गया था। इसके बाद परिवहन मंत्री आर एन सिंह से भी नीतीश ने इस्तीफा लिया था। दोनों नेताओं का नाम FIR में आने के बाद नैतिकता के दार पर उनसे पद छोड़ने के लिए कहा गया था।

लेकिन अब स्थिति वैसी नहीं है। गठबंधन की सरकार में राजद सबसे बड़ा भागीदार है। अगर नीतीश तेजस्वी से इस्तीफा लेते हैं तो सरकार ही संकट में पड़ जाएगी ? तब तो उनके सामने एक ही विकल्प बचेगा कि वे सिद्धांत के लिए सरकार को कुर्बान कर दें। नीतीश गुड गवर्नेंस के लिए जाने जाते हैं। इस लिए उनको अपनी साख की भी चिंता है ।

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