प्रधानमंत्री मोदी की लिट्टी चोखा खाते हुए तस्वीरें वायरल है. बुधवार को प्रधानमंत्री मोदी अचानक दिल्ली के राजपथ पर हुनर हाट में पहुंच गए. हुनर हाट का आयोजन अल्पसंख्यक मंत्रालय ने किया है. पीएम मोदी ने वहां लगे एक बिहारी स्टॉल से लिट्टी चोखा खाया. इसके बाद उनकी लिट्टी चोखा खाते हुए तस्वीरें वायरल हो गई.



सोशल मीडिया पर काफी सारे लोग इसे शेयर करने लगे. बिहारी पहचान वाले लिट्टी चोखा खाते हुए पीएम मोदी की तस्वीरों के राजनीतिक मायने निकाले जाने लगे. लोगों ने तस्वीरें शेयर करते हुए इसे बिहार के गौरव की तरह पेश किया. प्रधानमंत्री मोदी ने खुद अपने ट्विटर हैंडल से लिट्टी चोखा खाते हुए तस्वीरें शेयर की. उन्होंने लिखा- आज लंच में लिट्टी चोखा का स्वाद लिया और एक कप चाय भी पी.



बिहार की पहचान है लिट्टी-चोखा
लिट्टी चोखा को बिहार का व्यंजन माना जाता है. बिहारी पहचान वाले इस व्यंजन को लोग चाव से खाते हैं. बिहार के लोगों ने इसे दूसरे राज्यों में भी फैलाया है. आज लिट्टी चोखा के स्टॉल हर शहर में दिख जाते हैं. लिट्टी चोखा खाने में स्वादिष्ट तो होता ही है, ये सेहत के लिए भी फायेदमंद है.

गेहूं के आटे में सत्तू को भरकर इसे आग पर पकाया जाता है. फिर देसी घी में डुबोकर इसे खाया जाता है. जिन्हें कैलोरी की फिक्र है, वो बिना घी में डुबोये लिट्टी का स्वाद ले सकते हैं. तला-भुना नहीं होने की वजह से ये सेहत के लिए अच्छा है. इसे ज्यादातर बैंगन के चोखे के साथ खाया जाता है. बैंगन को आग में पकाकर उसमें टमाटर, मिर्च और मसाले को डालकर चोखा तैयार किया जाता है. बिहार का ये व्यंजन राजस्थान के बाटी-चूरमा की तरह है. बिहार में ये खासा लोकप्रिय है. इसे बनाना भी आसान है और ये पौष्टिक भी है.

litti chokha a dish from magadh era know everything you should know about bihari delicacy
लिट्टी-चोखा बिहार का मशहूर व्यंजन है.

मगध काल से जुड़ा है लिट्टी-चोखा का इतिहासलिट्टी-चोखा का इतिहास दिलचस्प है. इसका इतिहास मगध काल से जुड़ा है. कहा जाता है कि मगध साम्राज्य के दौरान लिट्टी चोखा प्रचलन में आया. बाद में ये मगध साम्राज्य से देश के दूसरे हिस्सों में भी फैला. मगध बहुत बड़ा साम्राज्य था. इसकी राजधानी पाटलीपुत्र हुआ करती थी, जिसे आज बिहार की राजधानी पटना के तौर पर जाना जाता है.

ग्रीक यात्री मेगास्थनीज जब 302 ईसापूर्व में पाटलीपुत्र आया था, तो वो वहां की भव्यता देखकर हैरान रह गया था. मेगास्थनीज ने लिखा था कि इस भव्य शहर में 64 गेट, 570 टावर और कई बाग-बगीचे हैं. यहां महलों और मंदिरों की भरमार है. मेगास्थनीज ने लिखा था- मैंने पूरब के एक भव्य शहर को देखा है. मैंने पर्सियन महलों को भी देखा है. लेकिन ये शहर दुनिया का सबसे विशाल शहर है. मगध साम्राज्य के उसी बेहतरीन दौर में लिट्टी चोखा सबसे पहली बार अस्तित्व में आया.

मुगल काल में बदल गया लिट्टी चोखा का स्वाद
लिट्टी-चोखा का जिक्र मुगल काल में भी मिलता है. लेकिन इस दौर में इसका स्वाद बदल गया. मुगल काल में मांसाहार ज्यादा प्रचलित था. इस दौर में लिट्टी के साथ शोरबा और पाया खाने का प्रचलन शुरू हुआ. इसी तरह ब्रिटिश शासन के दौरान भी इसमें तब्दिली आई. अंग्रेजों ने अपनी पसंदीदा करी के साथ लिट्टी का स्वाद लिया. जैसे-जैसे वक्त बदलता गया, लिट्टी चोखा को लेकर नए-नए प्रयोग भी होते गए.

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लिट्टी चोखा बिहार के लोग चाव से खाते हैं.

स्वतंत्रता आंदोलन में सेनानियों के लिए बनाया जाता था लिट्टी चोखा
लिट्टी चोखा को युद्ध का खाना भी कहा जाता है. प्राचीन काल से युद्ध के दौरान सैनिक खाने के सामान के तौर पर लिट्टी लेकर चलते थे. लिट्टी की खासियत है कि ये जल्दी खराब नहीं होता. इसे बनाना भी आसान है और ये काफी पौष्टिक भी होता है.

1857 के विद्रोह में सैनिकों के लिट्टी चोखा खाने का जिक्र मिलता है. तात्या टोपे और रानी लक्ष्मी बाई ने इसे अपने सैनिकों के खाने के तौर पर चुना था. इसे फूड फॉर सरवाइवल कहा गया. उस दौर में ये अपनी खासियत की वजह से युद्धभूमि प्रचलन में आया. इसे बनाने के लिए किसी बर्तन की जरूरत नहीं है, इसमें पानी भी कम लगता है और ये सुपाच्य और पौष्टिक भी है. सैनिकों को इससे लड़ने की ताकत मिलती. ये जल्दी खराब भी नहीं होता. एक बार बना लेने के बाद इसे दो-तीन दिन तक खाया जा सकता है.

Sources:-News18

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