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लालू यादव की साख दांव पर लगी है इस रैली में, पूरे देश की निगाहें टिकी हैं गांधी मैदान पर

खबरें बिहार की

पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में राजद की बहुप्रतीक्षित देश बचाओ-भाजपा भगाओ रैली रविवार को होने जा रही है। इसकी सारी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। राज्य में महागठबंधन सरकार के बिखरने और राजद के सत्ता से बेदखल होने के बाद पूरे देश की नजर इस रैली पर टिकी हुई है।

रैली इस मायने में भी खास है कि एक ओर जहां लालू यादव अपनी सियासी ताकत का प्रदर्शन कर पूरे देश में भाजपा विरोधी पार्टियों को गोलबंद करने की कोशिश करेंगे। साथ ही अपने बेटे तेजस्वी यादव को भाजपा विरोधी चेहरे के रूप में सामने ला सकते हैं।

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वहीं, दूसरी ओर विरोधी दल भी इस रैली से एहसास हो जायेगा कि लालू यादव का वोट बैंक अभी भी बना हुआ है और आने वाले दिनों में उनसे किस तरह से निपटा जा सकता है।

रैली के बाद देश के राजनीति में बड़े बदलाव की संभावना
लालू यादव की रैली के बाद देश की राजनीति में काफी बदलाव की संभावना व्य क्तल की जा रही है। एक ओर जहां जदयू के बागी शरद यादव के अगले कदम का भी इंतजार किया जा रहा है।

भाजपा विरोधी रैली में शामिल होकर वह एक तरह से जदयू को कार्रवाई के लिए चुनौती देने की तैयारी कर चुके हैं। वहीं, इसी रैली में भी समाजवादी पार्टी के विभाजन की भी पटकथा लिखी जायेगी।

समाजवादी पार्टी के अध्यतक्ष और यूपी पूर्व मुख्यसमंत्री अखिलेश यादव इस रैली में शिरकत कर रहे हैं, तो उनके पिता मुलायम सिंह यादव और चाचा शिवपाल यादव उनके इस कदम के खिलाफ थे।

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साथ जाने पर दुविधा में बिहार कांग्रेस
वहीं, 20 महीनों के शासन के बाद राजनीतिक घटनाक्रम में हाथों से शासन की बागडोर जाते ही कांग्रेस दुविधा में आ गई है। कांग्रेस उपाध्यक्ष सोनिया गांधी की बीमारी और राहुल की विदेश यात्रा का हवाला देकर कांग्रेस ने लालू प्रसाद और उनकी रैली से भले ही पल्ला झाड़ लिया हो, लेकिन इस फैसले ने बिहार कांग्रेस को संशय में ला दिया है।

आलाकमान का यह फैसला बिहार कांग्रेस के नेताओं की समझ से परे है कि लालू प्रसाद के साथ चलना है या फिर उनसे दूरी बनानी है। यह संशय इस वजह से पैदा हुआ है राहुल-सोनिया की गैरमौजूदगी में पार्टी के सीनियर लीडर गुलाम नबी आजाद और बिहार प्रभार सीपी जोशी लालू प्रसाद की रैली में शामिल होंगे।

बिहार के कुछ नेताओं का मानना है कि लालू कांग्रेस को कभी आगे नहीं बढ़ने देंगे। हमेशा पिछलग्गू बनाकर रखेंगे। वहीं कुछ का मानना है कि लालू के साथ कांग्रेस आगे बढ़ सकती है।

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पूरे देश से भाजपा विरोधी नेता हो रहे शामिल

रैली में भाग लेने के लिए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद, सीपी जोशी एवं एनसीपी के तारिक अनवर समेत विभिन्न दलों के करीब 21 नेताओं ने सहमति दी है।

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, उपाध्यक्ष राहुल गांधी एवं बसपा प्रमुख मायावती को भी आमंत्रित किया गया था, किंतु विभिन्न कारणों से उनका कार्यक्रम नहीं बन सका।

लालू को अपने बेटों को स्थापित करने का मौका
नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव के खिलाफ नीतीश सरकार में डिप्टी सीएम रहते भ्रष्टाचार के आरोप लगने के बाद लालू की मंशा देशभर के भाजपा विरोधी बड़े नेताओं को एक मंच पर लाकर अपनी ताकत दिखाने की है।

राजद की रैली से कुछ बड़े नेताओं ने भले ही किनारा कर लिया है, लेकिन इससे लालू की तैयारियों और तेवर पर कोई खास असर नहीं पड़ा है।
भीड़ के जरिए सियासी ताकत का प्रदर्शन उनका पुराना हथकंडा रहा है। 90 के दशक में बिहार में अपनी सरकार के दौरान गरीब महारैला के आयोजनों के जरिए लालू प्रसाद कई बार ऐसा कर भी चुके हैं। इस बार भी पूरी तैयारी है।

हालांकि सूबे के 19 जिलों में पिछले दो हफ्ते से बाढ़ के चलते रैली की भीड़ पर असर से इनकार नहीं किया जा सकता है। फिर भी लालू के समर्थकों का विभिन्न जिलों से टोलियों में पटना पहुंचना शनिवार सुबह से ही जारी है। लालू एक बार फिर से ‘माय’ समीकरण को मजबूत कर अपने खोये जनाधार को पाने की कोशिश में हैं।

 

बाढ़ के बहाने भाजपा नेताओं का विरोध
भाजपा नेता और बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी ने कहा कि एक ओर जहां बिहार के करोड़ों की आबादी बाढ़ से प्रभावित है। उनके सामने खाने और रहने की समस्याम उत्प न्ने हो चुकी है, लेकिन गरीबों का मसीहा बताने वाले लालू को इसकी कोई फिक्र नहीं है। भ्रष्टाचार के मामले में सजायाफ्ता लालू प्रसाद बेनामी संपत्ति बचाओ फ्लॉप रैली के लिए गांधी मैदान का चक्कर लगाते रहे हैं।

जदयू ने बताया ‘अवैध संपत्ति बचाओ’ रैली
लालू यादव की भाजपा भगाओ, देश बचाओ रैली पर जदयू प्रवक्ता नीरज कुमार ने तंज कसते हुए कहा कि 27 अगस्तल को प्रस्ताविक अवैध संपत्ति बचाओ रैली गांधी मैदान पटना में मंच पर एक शोकेस अवश्य बनाये जाये, जिसमें आपके परिवार द्वारा अर्जित नामी-बेनामी संपत्ति से संबंधित दस्तावेजों की छायाप्रति मौजूद हो, ताकि जनता उसे देख सके।

 

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