लालू यादव का जलवा रहेगा बरकरार या सियासत में हो गए हैं अप्रासंगिक, 2024 के चुनाव में हो जाएगा क्लीयर

कही-सुनी राजनीति

 आरजेडी के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव को एक दशक पहले जिन्होंने देखा-सुना होगा, उन्हें अब लालू की सूखी काया और आहिस्ता आवाज जरूर निराश करती होगी। लेकिन यह तो मानना ही पड़ेगा कि उनका जलवा अब भी बरकरार है। पटना आए लालू को देखने के लिए जिस तरह आरजेडी कार्यकर्ताओं-समर्थकों का हुजूम उमड़ रहा है, उसे देख कर तो यही लगता है कि एक खास पीढ़ी के लोग तो लालू को अपना आराध्य मानते ही हैं। नयी पीढ़ी की राजनीति में लालू कितना प्रासंगिक होंगे, यह देखना दिलचस्प होगा।

लालू के बिना जलवा दिखा चुके हैं तेजस्वी

कभी लालू अपने हावभाव, बोली और अंदाज से सामान्य जन तो दूर, बड़े-बड़े सियासी नेताओं को पल भर में आकर्षित कर लेते थे। चुनावों में भी लालू का आकर्षण परिलक्षित होता था। हालांकि चारा घोटाले में जब से उनकी जेल यात्रा शुरू हुई, लालू ने पार्टी की कमान अघोषित तौर पर अपने छोटे बेटे तेजस्वी यादव को सौंप दी। तेजस्वी ने अपनी सूझबूझ का परिचय दिया। 2015 के विधानसभा चुनाव तक तो लालू का मंत्र काम करता रहा, लेकिन 2020 में तेजस्वी यादव बिल्कुल अकेले पड़ गए। इसके बावजूद तेजस्वी ने अपनी सूझबूझ से महागठबंधन का ढांचा खड़ा किया। टिकट बंटवारे की मुश्किलें पार कीं। आखिरकार आरजेडी को सबसे बड़ी पार्टी बना कर विधानसभा में उतार दिया। वैसे उनकी यह कामयाबी काम नहीं आई। बहुमत के जादुई आंकड़े से दर्जन भर पीछे छूट गए।

तेजस्वी ने नीतीश कुमार को भी पटा लिया


तेजस्वी यादव विधानसभा चुनाव की पहली सियासी परीक्षा में पास हो गए। उनके सामने दूसरी परीक्षा थी, किसी भी हाल में राज्य की सत्ता में साझीदार बनना। संयोगवश लालू पिछले साल बिहार में ही थे। जब तेजस्वी ने जातीय जनगणना के सवाल पर नीतीश को पटा लिया तो कयास लगने लगा कि आरजेडी और जेडीयू किसी भी वक्त हाथ मिला सकते हैं। फिर आया रमजान का महीना और राबड़ी आवास पर हुई इफ्तार पार्टी में नीतीश ने शिरकत की। महागठबंधन की सरकार बनने की बुनियाद यहीं पड़ी। साल 2022 की आखिरी तिमाही में तेजस्वी ने यह परीक्षा भी पास कर ली। बिहार में महागठबंधन की सरकार बन गई और नीतीश एनडीए छोड़ महागठबंधन का हिस्सा बन गए।

विपक्षी एकता में भी है तेजस्वी की है भूमिका

नीतीश कुमार जब महागठबंधन का हिस्सा बने तो उन्हें आरजेडी ने पीएम फेस बताना शुरू किया। नीतीश को लालू ने टास्क दिया कि विपक्ष को एकजुट करने की दिशा में आगे बढ़ें। खुद पीएम पद के दावेदार बनें। नीतीश का सियासी रसूख किसी से कम नहीं रहा है। लगातार 18 साल से सीएम और केंद्र में मंत्री रहने के कारण उनके संपर्क भी किसी से कम नहीं हैं। लेकिन लालू के साथ आकर उन्हें विपक्षी एकता की पहल करने में संकोच होने लगा। उनका संकोच भी लालू ने ही खत्म किया। साथ लेकर सोनिया गांधी से मिलने गए। उसके बाद पता नहीं क्या हुआ, नीतीश ने विपक्षी एकता के सवाल पर चुप्पी साध ली। तेजस्वी ने लालू यादव की तरह नीतीश कुमार का काम आसान किया। तमिलनाडु के सीएम एमके स्टालिन से उन्होंने संबंध बनाए। आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल से वह मिले। झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन से संपर्क बढ़ाया। यानी जो काम नीतीश कुमार को करना था, उसमें तेजस्वी ने बड़ी भूमिका निभायी। इतना ही नहीं, नीतीश ने बंगाल की सीएम ममता बनर्जी और यूपी के पूर्व सीएम अखिलेश यादव से जब मुलाकात की तो उस वक्त साथ में तेजस्वी यादव भी मौजूद रहे।

लालू यादव से अलग सोच के तेजस्वी यादव

लालू यादव ने राजनीति के अपने अच्छे दिनों में जातीय जकड़न में उलझे बिहार में एम-वाई समीकरण की नींव डाली। मुस्लिम और यादवों के सहयोग से वे सरकार चलाते रहे। सामाजिक न्याय उनका सूत्र था। दलित-पिछड़े तबके के लोगों को बूथों तक पहुंचाया। लेकिन उनके ही बेटे तेजस्वी की सोच उनसे मेल नहीं खाती। तेजस्वी सिर्फ एम-वाई तक ही पार्टी को सीमित रखना नहीं चाहते। उन्होंने पार्टी के लिए अब ए टू जेड का नारा दिया है। यानी सभी जातियों का प्रतिनिधित्व आरजेडी में रहेगा।

आनंद मोहन के बाप ने फंसाया, बेटे ने बचाया

ए टू जेड का संदेश देने के लिए तेजस्वी यादव ने अपने विधायक चेतन आनंद के पिता आनंद मोहन को जेल से रिहा करने का रास्ता साफ किया। सीएम के नाते इसका श्रेय भले नीतीश कुमार लेना चाहें, लेकिन सच यही है कि तेजस्वी के दबाव पर ही जेल में सजा काट रहे आनंद मोहन की रिहाई का रास्ता साफ हुआ है। इससे राजपूतों में आरजेडी ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि उसे सवर्णों से कोई एतराज नहीं है।

अब कितना कारगर होगा लालू यादव का जादू

लालू यादव ने जाति से इतर कोई राजनीति नहीं की। भूरा बाल (भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण, लाला) साफ करो का नारा भी लालू के राज में ही लगा था। आरक्षण और अगड़े-पिछड़े की राजनीति से इतर उनके पास कोई ऐसा हथियार नहीं है, जिससे सियासत की नैया वे पार कर सकें। वर्षों पहले आजमाया उनका यह नुस्खा अब कितना कारगर रह गया है, 2024 के लोकसभा चुनाव में इसका अंदाज लगेगा। अगर उनकी कोई भूमिका रही तो यह देखने वाली बात होगी कि लालू अब भी प्रासंगिक हैं या बदले हालात में अब उनकी राजनीति अप्रासंगिक हो गई है। हालांकि 2020 के विधानसभा चुनाव में बिना लालू उनके बेटे तेजस्वी ने दिखा दिया है कि अब राजनीति में उनकी कोई जरूरत नहीं।

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