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लालू के लिए रही महा-रैली, लेकिन नीतीश के लिए भी खतरा नहीं…..

राजनीति

राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) ने रविवार को पटना में एक विशाल रैली का आयोजन किया, जो लालू यादव के 90 के दशक में आयोजित गरीब रेला का रिकॉर्ड तो नहीं तोड़ पाई, लेकिन इस रैली में आई भीड़ का महत्व इसलिए बढ़ जाता है, क्योंकि अभी राज्य के 18 जिलों में लोग बाढ़ की विभीषिका से प्रभावित हैं. रैली के बाद अगर लालू मुस्कुरा रहे हैं तो वहीं नीतीश के चेहरे पर परेशानी की लकीर देखने को नहीं मिल रही हैं. इसके पीछे के ये 10 अहम कारण हैं.

लालू इस बात से खुश होंगे कि उनका मूल वोटवैंक जो यादव-मुस्लिम है, वो उनके समर्थन में एक बार फिर एकजुट और एकत्रित है.

इस रैली के बाद लालू इस बात को लेकर आश्वस्त होंगे कि उनके उत्तराधिकारी तेजस्वी यादव में रैली में भीड़ जुटाने की कला आ गई हैं. आरजेडी के 20 वर्षों के इतिहास में पहली बार इतना सब कुछ सलीके से हुआ. चाहे मंच हो या सोशल मीडिया, तेजस्वी ने रैली को सफल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी.

इस रैली के माध्यम से लालू ने अपने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को ये संदेश दे दिया कि जब पार्टी की अगली कतार में बैठने की बात होगी, तो अब रघुवंश प्रसाद सिंह, अब्दुल बारी सिद्दीकी जैसे नेताओं को तेजप्रताप और मीसा भारती के पीछे ही बैठना होगा.
लालू इस बात से खुश होंगे कि उनका मूल वोटवैंक जो यादव-मुस्लिम है, वो उनके समर्थन में एक बार फिर एकजुट और एकत्रित है.

लेकिन इस रैली में अन्य जातियों के लोग भी आए थे, लेकिन वे वोट किसको देंगे उसके बारे में लालू या तेजस्वी के नाम पर वे खुलकर नहीं बोल रहे थे. इसका मतलब है कि अभी भी लालू गैर-यादव वोटर को अपील नहीं करते

आरजेडी की अगली पीढ़ी जो जीन्स पहनती है, मोबाइल रखती है, उसे तेजस्वी यादव, नीतीश का विकल्प लगते हैं. लेकिन ये लालू के 90 के दशक के समर्थकों की तरह उतना आक्रामक नहीं हैं.
लालू इस बात को लेकर बहुत संतुष्ट होंगे कि चाहे ममता बनर्जी हों या अखिलेश यादव या गुलाम नबी आजाद सब तेजस्वी यादव को उनका उत्तराधिकारी समझते हैं

लालू यादव अपने बड़े बेटे तेजप्रताप यादव के पब्लिक में भाषण को लेकर चिंतित रहते थे, लेकिन तेजप्रताप ने जिस शैली में गांधी मैदान में भाषण दिया, उससे न केवल लालू राहत की सांस ले रहे होंगे, बल्कि आश्वस्त होंगे कि उनकी भाषण शैली का कुछ अंश तेजप्रताप के पास है.

लालू यादव ने इस रैली के माध्यम से साबित कर दिया कि बिना सत्ता के भी आरजेडी सफल रैली आयोजित कर सकती है.
लालू को इस बात का एहसास जरूर हुआ होगा कि आप लाखों लोग को जुटा लीजिए, खूब खातिरदारी कीजिए, लेकिन सोशल मीडिया में एक गलत फोटो सारे उत्साह पर पानी फेर सकता है, जैसा रविवार को हुआ

लेकिन लालू यादव की रैली की सफलता से नीतीश को चिंता करने की इसलिए जरूरत नहीं है, क्योंकि लालू अपने कुनबे और आधारभूत वोट को समेटने में भले कामयाब हों, लेकिन इसके खिलाफ गोलबंदी से नीतीश के नेतृत्व वाली गठबंधन को लाभ मिलेगा.

नीतीश को लालू यादव जितना अपने निशाने पर रखेंगे, उससे नीतीश बिहार में एक बड़े वर्ग के नेता के रूप में मजबूत बने रहेंगे. लालू यादव या तेजस्वी यादव भले भ्रष्टाचार के आरोप लगाएं, लेकिन वो खुद इतने आरोपों से घिरे हैं कि उनकी दलीलों में दम नहीं रह जाता.

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