हिंदू कैलेंडर के अनुसार अगहन माह के कृष्णपक्ष की अष्टमी को कालभैरव अष्टमी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन कालभैरव की विशेष पूजा और अाराधना की जाती है। इस बार कालभैरव अष्टमी 19 नवंबर को मनाई जाएगी। कालभैरव का उल्लेख हिन्दू पौराणिक ग्रन्थों में मिलता है। शिव पुराण के अनुसार कालभैरव भगवान शिव का रौद्र रूप है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के उल्लेखानुसार कालभैरव श्रीकृष्ण के दाहिने नेत्र से प्रकट हुए थे, जो आठ भैरवों में से एक थे। कालभैरव रोग, भय, संकट और दुख के स्वामी माने गए हैं। इनकी पूजा से हर तरह की मानसिक और शारीरिक परेशानियां दूर हो जाती हैं। 

  • पुराणों में बताए गए हैं 8 भैरव

स्कंद पुराण के अवंति खंड के  अनुसार भगवान भैरव के 8 रूप माने गए हैं। इनमें से कालभैरव तीसरा रूप है। शिव पुराण के अनुसार माना जाता है कि शाम के समय जब रात्रि अगमन और दिन खत्म होता है तब प्रदोष काल में शिव के रौद्र रूप से भैरव प्रकट हुए थे। भैरव से ही अन्य 7 भैरव और प्रकट हुए जिन्हें अपने कर्म और रूप के अनुसार नाम दिए गए हैं। जिनके नाम हैं-

रुरुभैरव

संहारभैरव

कालभैरव

असितभैरव

क्रोधभैरव

भीषणभैरव

महाभैरव

खटवांगभैरव

  • काल भैरव

भैरव का अर्थ है भय को हरने वाला या भय को जीतने वाला। इसलिए कालभैरव रूप की पूजा करने से मृत्यु और हर तरह के संकट का भय दूर हो जाता है। नारद पुराण में बताया गया है कि कालभैरव की पूजा करने से मनुष्‍य की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है। मनुष्‍य किसी रोग से लम्बे समय से पीड़‍ि‍त है तो वह रोग, तकलीफ और दुख भी दूर होती हैं। कालभैरव की पूजा पूरे देश में अलग-अलग नाम से और अलग तरह से की जाती है। कालभैरव भगवान शिव की प्रमुख गणों में एक हैं।

Sources:-Dainik Bhasakar

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