कोयले के अनुपात व सफाई में लापरवाही से फटती है चिमनी, ब्लास्ट के ये हैं संभावित कारण

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रामगढ़वा थाना क्षेत्र के नरीरगीर के समीप शुक्रवार शाम ईंट भट्ठे की चिमनी में ब्लास्ट होने से आठ लोगों की मौत हो गई। दो दर्जन लोग घायल हो गए हैं। इनमें 8 की स्थिति गंभीर है। मरने वाले और घायलों की संख्या बढ़ सकती है। घटना के वक्त करीब 60 लोग मौजूद थे। मलबे में अभी कुछ लोगों के दबे होने की आशंका जताई जा रही है। अधिकारियों के अलावा रेस्क्यू टीम मौके पर पहुंची। एसडीआरपीएफ की टीम भी पहुंची है। देर रात तक बचाव अभियान जारी रहा। शनिवार सुबह तड़के कोहरा छटते ही बचाव टीम फिर मुस्तैद हो गई।

वहीं गोपालगंज में भी एक ऐसा ही मामला सामने आया है, जो अपने आप में चिंता का विषय है। बरौली थाना क्षेत्र के नवादा गांव के पास स्थित चिमनी को चालू करने के लिए शुक्रवार की दोपहर बाद मजदूर कार्य कर रहे थे। भट्ठी में कच्ची ईट के बीच कोयला भरने के बाद आग लगाने पर चिमनी में अचानक विस्फोट हो गया।

ब्लास्ट की संभावित वजह

पूर्वी चंपारण के रक्सौल और गोपालगंज में ईंट भट्ठा चिमनी के ब्लास्ट होने का एक कारण इंटरनल फर्नेस (भट्ठे) के विभिन्न चैंबरों में बननेवाली गैस भी हो सकती है। हालांकि, यह जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा। डा. भीमराव आंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय में भौतिकी विभाग के अध्यक्ष प्रो. (डा.) ललन कुमार झा का कहना है कि किसी भी फर्नेस में कोयला फिलिंग का अनुपात महत्वपूर्ण होता है। इसके लिए भट्ठों पर विशेषज्ञ होते हैं।

कई बार फर्नेस में कोयला डालने के अनुपात में गड़बड़ी हो जाती है और मात्रा अधिक होने से अनियमित इंटरनल टेंपरेचर (आंतरिक उष्मा) विकसित हो जाता है। यह एक हजार डिग्री सेंटीग्रेड से ऊपर चला जाता है। इससे ईंट व अंदर के स्ट्रक्चर पिघलने लगते हैं और भट्ठी समेत चैंबर व चिमनी में कार्बन मोनो आक्साइड गैस भरने लगती है। इस अवस्था में चिमनी के फटने की आशंका प्रबल हो जाती है।

चिमनी की सफाई व मरम्मत नहीं होना भी खतरनाक

प्रो. ललन कुमार का कहना है कि चिमनी के ऊपर बाहर की ओर कैपिंग की जाती है। इसका काम बरसात में पानी और ठंड में ड्यू (ओस) ड्राप्स को रोकना होता है। इस मौसम में पानी या ड्यू अंदर जाता है तो ईंटों पर जमकर फैल जाता है। इससे ईंटों में नमी आती है। बरसात के बाद और ठंड में चिमनी शुरू होने से पहले इसकी सफाई जरूरी होती है। ठंड में तो बीच-बीच में सफाई जरूरी होती है। खर्च बचाने के लिए संचालक इससे बचते हैं, जो घातक साबित होती है।

ईंट पकाने से पहले पूर्ण रूप से सुखाना जरूरी

डा. भीमराव आंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय में रसायन विज्ञान विभाग के प्रो. (डा.) रामजी साह का कहना है कि ईंटों को भट्ठे में पकाने से पहले धूप में पूर्ण सुखाना जरूरी होता है। कई बार अधिक ईंट तैयार करने और आर्डर पूरा करने के लिए भट्ठा संचालक आधी-अधूरी सूखी ईंटों को पकाने के लिए ले आते हैं। फर्नेस में इन्हें डालने पर अपर लेयर (ईंटों की ऊपरी सतह) तो पक जाता है, अंदर की नमी गर्म होकर कई प्रकार की गैस के रूप में फैलती है। इसमें मुख्य रूप से ईंट की नमी से निकला वाष्प, कोयला जलने से निकला कार्बन व मिथेन शामिल होते हैं। रासायनिक अभिक्रिया के बाद ये वाटर गैस के रूप में विकसित होकर फट जाते हैं

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