खतरे की घंटी: इस साल खेतों से लेकर घरों तक कीट-पतंग नदारद, जानिए वजह

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इस साल मौसम की मार आम जनजीवन ही नहीं, कीट-पतंगों पर भी पड़ी है। पीक अवधि में भी खेतों से घरों तक नदारद हैं। दिवाली नजदीक है पर बल्ब व अन्य लाइट के पास मंडराने वाले कीट-पतंग झुंड में नहीं दिख रहे हैं। पिछले साल के मुकाबले खेतों में हरा मधुआ, भूरा मधुआ और बड़े टिड्डे समेत अन्य कीड़ों का प्रकोप काफी कम है।

चूंकि, सूखे मौसम के कारण इनके प्रजनन में ही काफी कमी हुई है भोजपुर समेत राज्य भर में इस साल रासायनिक व जैविक दवाओं की खपत में चार से पांच प्रतिशत की कमी का आकलन किया गया है। कीटनाशक का कम उपयोग होने से किसानों के इस मद के खर्च में भले ही कमी आयी हो पर पर्यावरणीय दृष्टिकोण से यह चिंतनीय है।

भोजपुर कृषि विज्ञान केंद्र के हेड डॉ पीके द्विवेदी बताते हैं कि कीट केवल नुकसान ही नहीं करते, पर्यावरण व इंसान के लिए जरूरी भी होते हैं। कचरे को रीसाइकल करने और कीट नियंत्रण में भूमिका निभाते हैं। कई मित्र कीट ऐसे हैं, जिनका जीवित रहना फसलों के लिए लाभप्रद है। इनके बिना पूरा चक्र टूट सकता है। कई मच्छर और कीट-पतंगें पौधों का रस पीकर जीवित रहते हैं। इनमें से अधिकतर परिंदों और चमगादड़ों का भोजन बनते हैं। इनके लार्वा से मछलियों और मेढकों को खाना मिलता है। यह प्राकृतिक फूड चेन है। यदि कीटों का अस्तित्व खत्म होने लगे, तो मानव जीवन पर भी प्रतिकूल असर पड़ना तय है।

क्या है वजह
एक फसल चक्र में कीड़ों का चार से छह-सात जीवन चक्र चलता है। अगस्त-सितंबर का महीना इनके लिए बेहद मुफीद होता है। अगस्त से इनका प्रजनन शुरू होता है और इनकी संख्या में लगातार वृद्धि के बाद 15 सितंबर से यह बेहद सक्रिय हो जाते हैं। दिवाली तक पीक पर होते हैं और फिर इनमें कमी आने लगती है। इस बार जून से सितंबर तक भोजपुर समेत राज्य में बारिश की 31 प्रतिशत कमी रही। मौसम सूखा रहने से कीड़ों की प्रजनन दर शुरुआती दौर में काफी कम रही।

क्या है खतरा
इस साल कीट-पतंगों की संख्या में आई भारी कमी भविष्य के लिए खतरे का संकेत है। एक शोध के अनुसार धरती से विलुप्त उन कीटों की प्रजातियां ज्यादा है, जो हानिकारक नहीं हैं। कीटों की संख्या करीब 41 प्रतिशत कम हो चुकी है। बागों मे 49 फीसदी भौरे कम हो गये हैं। 37 फीसदी पतंगें और 53 फीसदी तितलियां कम हो चुकी हैं। उड़ने वाले कीटों की तेजी से घटती संख्या चिंतनीय है। वैज्ञानिक स्पष्ट कर चुके हैं कि पूरा इको सिस्टम खाने और परागण के लिए इन कीटों पर निर्भर है। इनके खत्म होने से कीट खाने वाले पंछियों की संख्या घटेगी।राज्य में 2021 में खरीफ फसल के मौसम में 495 मीट्रिक टन रासायनिक और 175 मीट्रिक टन जैविक दवाओं की खपत हुई थी। इस साल खेतों में कीड़ों का कम प्रकोप होने से इसकी खपत चार से पांच प्रतिशत कम रहने का अनुमान है।
– डॉ प्रमोद कुमार, उप निदेशक, पौधा संरक्षण विभाग, बिहार

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