Karpuri Thakur ने जब इंदिरा गांधी की बात पर कहा था- मर जाएंगे, लेकिन बेटे का इलाज सरकारी खर्च से नहीं करायेंगे

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बिहार के पूर्व मुख्‍यमंत्री कर्पूरी ठाकुर की आज जयंती है। इस मौके पर बिहार के के साथ-साथ देश भर के नेता जन नायक को याद कर रहे हैं। कर्पूरी ठाकुर को गरीबों का मसीहा माना जाता है। कर्पूरी ठाकुर बेहद गरीब परिवार से आते थे। दो बार बिहार के मुख्यमंत्री और एक बार उप मुख्यमंत्री रहे। उनके बारे में कहा जाता है कि सत्ता मिलने के बावजूद उन्होंने कभी भी उसका दुरुपयोग नहीं किया। उनकी ईमानदारी के कई किस्से आज भी बिहार में आपको सुनने को मिलते हैं।

क्रर्पूरी ठाकुर से जुड़े कुछ लोग बताते हैं कि कर्पूरी ठाकुर जब राज्य के मुख्यमंत्री थे तो रिश्ते में उनके एक बहनोई उनके पास नौकरी के लिए गए। उन्होंने मुख्यमंत्री साले से नौकरी के लिए सिफारिश लगवाने कहा। बहनोई की बात सुनकर कर्पूरी ठाकुर गंभीर हो गए। उन्होंने अपनी जेब से पचास रुपये निकालकर उन्हें दिए और कहा कि जाइए और एक उस्तरा आदि खरीद लीजिए। अपना पुश्तैनी धंधा आरंभ कीजिए।

कर्पूरी ठाकुर की सादगी और ईमानदारी का ये एकमात्र किस्सा नहीं है। मौजूदा वक्त में नेता सत्ता मिलते ही अपने और परिवार के लिए धन-संपत्ति जुटाने के लिए नए-नए तरकीब ढूंढने लगता है। वहीं, स्वतंत्रता सेनानी कर्पूरी ठाकुर 1952 से लगातार दशकों तक विधायक रहे, पर अपने लिए उन्होंने एक मकान तक नहीं बनवाया।

बेटे की बीमारी में भी नहीं ली सरकार की मदद

जयंत जिज्ञासु की किताब में कर्पूरी ठाकुर की खुद्दारी के एक और प्रसंग का जिक्र है। कर्पूरी ठाकुर के छोटे बेटे का डॉक्टरी की पढ़ाई के लिए चयन हो गया था। इस बीच उसकी तबीयत खराब हो गयी। उसे दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में भर्ती कराया गया। डॉक्टरों ने बताया कि दिल की बीमारी है। ऑपरेशन के लिए मोटी रकम की जरूरत थी। ये बात जब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को पता चली तो उन्होंने अपने एक प्रतिनिधि को भेजा। इसके बाद कर्पूरी ठाकुर के बेटे को राम मनोहर लोहिया अस्पताल से निकाल कर एम्स में भर्ती कराया गया।

इसके बाद इंदिरा गांधी खुद अस्पताल गई और कहा कि वह सरकारी खर्च पर कर्पूरी ठाकुर के बेटे का इलाज अमेरिका में करवाएंगी। कर्पूरी ठाकुर को जब इस बात की जानकारी मिली, तो उन्होंने साफ मना कर दिया। उन्होंने साफ कहा कि मर जाएंगे, लेकिन बेटे का इलाज सरकारी खर्च से नहीं करायेंगे। बाद में जयप्रकाश नारायण ने पैसे का बंदोबस्त कराया और न्यूजीलैंड भेज कर उनके बेटे का इलाज कराया।

गांव में झोपड़ी देख कर रो पड़े थे यूपी के नेता

सत्तर के दशक में बिहार सरकार विधायकों और पूर्व विधायकों के निजी आवास के लिए पटना में सस्ती दर पर जमीन दे रही थी। जब कर्पूरी ठाकुर को आवास के लिए जमीन लेने के लिए कहा गया तो उन्होंने साफ मना कर दिया। इसपर एक विधायक ने उनसे कहा था कि आपका बाल-बच्चा कहां रहेगा? कर्पूरी ठाकुर ने कहा कि अपने गांव में रहेगा। कर्पूरी ठाकुर के निधन के बाद उत्तर प्रदेश के कद्दावर नेता हेमवंती नंदन बहुगुणा समस्तीपुर स्थित उनके गांव पितौंझिया गए तो पुश्तैनी झोपड़ी देख कर रो पड़े थे।

बिहार के नाई परिवार में जन्में ठाकुर अखिल भारतीय छात्र संघ में रहे। लोकनायक जयप्रकाश नारायण व समाजवादी चिंतक डॉ. राम मनोहर लोहिया इनके राजनीतिक गुरु थे। बिहार में पिछड़ा वर्ग के लोगों को सरकारी नौकरी में आरक्षण की व्यवस्था कराने की पहल की थी। भारत छोड़ो आंदोलन के समय कर्पूरी ठाकुर ने करीब ढाई साल जेल में बिताया। जनता के प्रति उनके सेवा भाव और लोकप्रियता के चलते उन्हें जन नायक कहा जाता है।

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