Madhubani painting artist art

क्या आप जानते हैं बिहार के गाँव “कला ग्राम” के बारे में ??

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ऐसे तो पूरा मिथिलांचल मधुबनी (मिथिला) चित्रकला के लिए जाना जाता है। पर मधुबन्नी रेलवे स्टेशन से करीब 4.5 किमी दूर बसे गाँव जितवारपुर का इस मामले में एक खास पहचान है, लोग इसे “कला ग्राम” के नाम से जानते है। यहाँ की बोली में मिठास और घर घर में बसे कलाकारी मन को मोह लेती है।

इस गाँव को लोग पद्म श्री सीता देवी जी के नाम से भी जानते है,इनका जन्म सन1914 को हुआ था। इन्होंने मिथिला चित्रकला में पूरे भारत वर्ष में अपना लोहा मनवाया एवं विश्व मे भर में अपना परचम लहराया।

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इनकी कलाकारी को देखते हुए पहली बार इन्हें सन 1969 में राज्यकीय एवं 1975 में राष्ट्रीय सम्मान से सम्मानित किया गया। मिथिला चित्रकला में इनका बढता योगदान के कारण इन्हें सन् 1981 में पद्म श्री एवं 1984 में बिहार रत्न से सम्मानित किया गया।

मधुबनी चित्रकला बिहार के दरभंगा, मधुबनी एवं नेपाल के कुछ क्षेत्रों (मिथिलांचल) की प्रमुख चित्रकला है। इस कला का प्रारम्भ रंगोली के रूप में हुआ था लेकिन धीरे-धीरे आधुनिक रूप में कागज़, कपड़ों एवं दीवारों पर उतर आई है।

माना जाता है यह कला रामायण काल से चली आ रही है, जब राजा जनक ने राम-सीता के विवाह के दौरान महिला कलाकारों से बनवाए थे। इस कलाकारी में मिथिला की महिलाएं मुख्य रूप से दक्ष मानी जाती थी पर अब पुरुषों ने भी इसमें अपनी उपस्थिति दर्ज किया है।

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मुख्य रूप से यह कलाकारी गांवों की मिट्टी से लीपी गई झोपड़ियों पर की जाती थी लेकिन इसे अब पेपर और कैनवास पर खूब बनाया जाता है।

इस कलाकारी में खासतौर पर हिन्दू देव-देवताओं के चित्र, प्राकृतिक नजारे जैसे- सूर्य व चंद्रमा, धार्मिक पेड़-पौधे जैसे- तुलसी और विवाह के दृश्य देखने को मिलते है।

मिथिला चित्रकला में मां दुर्गा, काली, सीता-राम, राधा-कृष्ण, शिव-पार्वती, गौरी-गणेश और विष्णु के दस अवतार इत्यादि के साथ साथ चित्रकार कि इस विधा में पासवान जाति के समुदाय के लोगों द्वारा राजा शैलेश के जीवन वृतान्त का चित्रण भी किया जाने लगा। इस समुदाय के लोग राजा शैलेश को अपने देवता के रूप में पूजते भी हैं।

इस चित्रकारी के लिए चटख रंगों का इस्तेमाल किया जाता है और चित्र में निखार लाने के लिए कुछ हल्के रंगों का भी प्रयोग किया जाता है।

सब से हैरानी तो यह जान कर होगी चित्रकारी के लिए रंगों को घरेलू चीजों से ही बनाया जाता है, जैसे- हल्दी, केले के पत्ते, लाल रंग के लिऐ पीपल की छाल प्रयोग किया जाता था और दूध। चित्रों को सजाने के लिए पशु पक्षी, वृक्ष, फूल पत्ती आदि को स्वस्तिक के निशानी के साथ सजाया जाता है।

चित्र बनाने के लिए माचिस की तीली व बाँस की कलम को प्रयोग में लाया जाता था एवं रंग की पकड़ बनाने के लिए बबूल के वृक्ष की गोंद को मिलाया जाता था। परन्तु लोग अब पेंट और विभिन्न रंगों के कलम को इस्तेमाल में लाते है।

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समय के साथ मधुबनी चित्रकला के मायने भी बदल चुके हैं, राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय स्तर पर अपने चित्रकला का लोहा मनवा चुके कलाकार अब पलायन को मजबूर हैं।

आर्थिक तंगी के कारण बहुत सारे कलाकारों की कला कागजों में ही लिपटी रह जाती है। लेकिन ये कला अभी भी अपने आप में इतना कुछ समेटे हुए है कि यह आज भी चित्रकला के कद्रदानों की पहली पसंद में से है।

© Srijan Raj

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