30 सालों से बंजर जमीन पर पौधे लगा बना दिया जंगल, मिला पद्मश्री सम्मान

सच्चा हिंदुस्तानी

जंगल को काटकर आधुनिक बनने की दौड़ और फिर जीने के लिए जंगल बचाने की चिंता से उपजे आंदोलन और सम्मेलन आधुनिकता की मार झेल रहे हम इंसानों और जंगल की बीच सिर्फ इतना ही रिश्ता है।

जंगल और जीवन से जुड़ी ऐसी ही कहानी है जादव पायेंग की। पायेंग की उम्र आज करीब 50 साल से उपर के हो गए है। 24 साल की उम्र में उनकी जिंदगी में एक रोमांचक मोड़ आया जब असम में बाढ़ आ गई थी।

बाढ़ की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि असम में घर पूरी तरह तबाह हो गए थे।

वहीं इंसान और जंगली जानवर भी काल का ग्रास बन चुके थे। ऐसे में हर कोई सरकार से मदद पाने के लिए राहत समाग्री पर आश्रित हो चुका था, लेकिन पायेंग को अपने खाने-पीने की चिंता से ज्यादा जंगल और पारिस्थितिकी तंत्र की थी।

पायेंग ये अच्छी तरह जानते थे कि हालात सामान्य होने के बाद असम के लोगों को जंगल की ओर ही लौटना पड़ेगा। तब सरकार की ओर से कोई मदद नहीं आएगी।

पायेंग ने सबसे पहले अपने घर के पास मौजूद ब्रह्मापुत्र नदी के पास बंजर पड़ी जमीन पर पौधे लगाने शुरू किए। देखते ही देखते उन्होंने कई इलाके कवर कर लिए।

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