संतान की लंबी उम्र और संपन्नता की कामना से किया जाता है जिवितपुत्रिका व्रत

जानकारी

हिन्दू कैलेंडर के अनुसार आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को जिवितपुत्रिका व्रत किया जाता है। इस बार ये व्रत रविवार 22 सितंबर को किया जाएगा। यह व्रत खासतौर से बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश में किया जाता है। जिवितपुत्रिका व्रत एक महत्वपूर्ण व्रत है। जिसमें माताएं दिन और रातभर निर्जला यानी बिना पानी का उपवास करती हैं। महाभारत काल से ही ये व्रत किया जा रहा है। कई जगहों पर इसे जीउतिया व्रत भी कहा जाता है।

  • व्रत का महत्व

जीवित्पुत्रिका व्रत स्त्रियों द्वारा संतान की मंगल कामना के लिए किया जाता है। जिवितपुत्रिका व्रत का अर्थ यानी जीवित पुत्र के लिए रखा जाने वाला व्रत। यह व्रत सभी सौभाग्यवती स्त्रियां रखती हैं, जिनको पुत्र होते हैं और साथ ही जिनके संतान नहीं होती वह भी पुत्र कामना और बेटी की लंबी आयु के लिए यह व्रत रखती हैं। माताएं अपने बच्चों की अच्छी सेहत की कामना से दिन और रातभर निर्जला यानी बिना पानी पिए ये उपवास करती हैं। इस व्रत को करने से संतान को लंबी उम्र के साथ अच्छा स्वास्थ्य और संपन्नता प्राप्त होती है।

  • व्रत की विधि – 

जीवित्पुत्रिका व्रत में तीन दिन तक उपवास किया जाता है: 

  1. पहला दिन: इस व्रत में पहले दिन को नहाय-खाय कहा जाता है। इस दिन महिलाएं नहाने के बाद एक बार भोजन करती हैं और फिर दिन भर कुछ नहीं खाती हैं।
     
  2. दूसरा दिन: व्रत में दूसरे दिन को खुर जीउतिया कहा जाता है। यही व्रत का विशेष व मुख्‍य दिन है जो कि अष्‍टमी को पड़ता है। इस दिन महिलाएं निर्जला रहती हैं। यहां तक कि रात को भी पानी नहीं पिया जाता है।
     
  3. तीसरा दिन: व्रत के तीसरे दिन पारण किया जाता है। इस दिन व्रत का पारण करने के बाद भोजन ग्रहण किया जाता है।
  • व्रत की कथा
  • महाभारत युद्ध के बाद पाण्डवों की गैर मौजूदगी में कृतवर्मा और कृपाचार्य को साथ लेकर अश्वत्थामा पाण्डवों के शिविर में गए। अश्वत्थामा ने द्रौपदी के पुत्रों को पाण्डव समझकर उनके सिर काट दिए। दूसरे दिन अर्जुन कृष्ण भगवान को साथ लेकर अश्वथामा की खोज में गए और उन्हें बन्दी बना लिया, लेकिन फिर धर्मराज युधिष्ठर और श्रीकृष्ण के परामर्श पर अश्वत्थामा के सिर की मणि लेकर तथा केश मूंड़कर उसे बन्धन से मुक्त कर दिया गया।
  • अश्वत्थामा ने अपमान का बदला लेने के लिये अमोघ अस्त्र का प्रयोग पाण्डवों के वशंधर उत्तरा के गर्भ पर किया। इसके बाद पाण्डवों ने श्रीकृष्ण से उत्तरा के गर्भ की रक्षा की प्रार्थना की। फिर भगवान श्रीकृष्ण ने सूक्ष्म रूप से उत्तरा के गर्भ में प्रवेश करके उसकी रक्षा की। किन्तु उत्तरा के गर्भ से मृत बालक उत्पन्न हुआ। भगवान श्रीकृष्ण ने उसे प्राण दान दिया। वही पुत्र पाण्डव वंश का भावी कर्णाधार परीक्षित हुआ। परीक्षित को इस प्रकार जीवनदान मिलने के कारण इस व्रत का नाम “जीवित्पुत्रिका” पड़ा।

Sources:-Dainik Bhasakar

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