सीतामढ़ी में होगा माता सीता के भव्य ‘जानकी मंदिर’ का निर्माण

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सनातन धर्मावलंबियों के लिए उत्तर प्रदेश के अयोध्या की तरह बिहार के सीतामढ़ी का भी खासा महत्व है. बिहार के सीतामढ़ी शहर से पांच किलोमीटर की दूरी पर स्थित है पुनौरा गांव. ऐसी मान्यता है कि अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र श्रीराम की पत्नी माता जानकी की यह जन्मस्थली है. अयोध्या में भगवान श्रीराम के भव्य मंदिर बनने की शुरुआत के बाद अब बिहार की सीतामढ़ी में सीता जी के जन्मस्थान पर भव्य जानकी मंदिर बनाने की कवायद शुरू हो गई है. योजना पर काम तेजी से चल रहा है. अगर सब कुछ सही रहा तो साल के आखिर में मंदिर निर्माण रफ्तार पकड़ लेगा.

श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के सदस्य कामेश्वर चौपाल ने इसका ऐलान किया है. जानकी की जन्मस्थली के रूप में विख्यात पुनौरा धाम में जानकी मंदिर बना हुआ है. कामेश्वर चौपाल कहते हैं कि भगवान राम के भव्य मंदिर के निर्माण के साथ ही बिहार के सीतामढ़ी में भव्य मंदिर निर्माण अभियान शुरू होगा और इसके लिए जानकी सखी नाम के संगठन का काफी तेजी से विस्तार हो रहा है. जानकी सखी संगठन बिहार के विभिन्न जिलों में पहुंचकर लोगों को सीता माता की जन्मभूमि सीतामढ़ी में मंदिर निर्माण को लेकर जागरूक करके अभियान चलाएंगे. कामेश्वर चौपाल कहते हैं कि जानकी सखी ने बिहार के कई जिलों में लोगों को जोड़ने का काम शुरू कर दिया है, जिसमें सीमांचल और मिथिलांचल शामिल है. बहुत जल्द इसका विस्तार पूरे बिहार में होगा और इस साल के आखिर तक संतों के साथ मिलकर सीतामढ़ी में भव्य जानकी मंदिर के निर्माण का स्वरूप तय होगा.

पटना के महावीर मंदिर के प्रमुख आचार्य किशोर कुणाल ने भी इसका खुलकर समर्थन किया है. उन्होंने कहा है कि यह काम तो पहले ही होना चाहिए था, क्योंकि माता सीता के बिना भगवान राम अधूरे हैं. उन्होंने कहा कि सीतामढ़ी की बेहद उपेक्षा हुई है. अब वक्त है कि राम मंदिर के निर्माण के साथ ही सीतामढ़ी में भी भव्य मंदिर का निर्माण शुरू हो, ताकि अयोध्या और सीतामढ़ी दुनिया के मानचित्र पर अध्यात्मिक नगरी के तौर पर स्थापित हो सके. किशोर कुणाल कहते हैं कि महावीर मंदिर की तरफ से अयोध्या में राम रसोई का संचालन हो रहा है, तो सीतामढ़ी में सीता रसोई का. यहां आने वाले श्रद्धालुओं को सीता रसोई से प्रसाद के तौर पर भोजन परोसा जाता है. उन्होंने कहा कि सीतामढ़ी में भव्य जानकी मंदिर का निर्माण होने से वह गौरव फिर से हासिल होगा, जो कहीं न कहीं भुला दिया गया है.

काफी समय से लोग इसे विकसित करने की मांग करते रहे हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी रामायण सर्किट परियोजना के तहत राम व सीता से जुड़े उन सभी स्थलों व रास्तों को विकसित करने की योजना बनी, जहां वे दोनों गए थे और जो रामायण से जुड़ी पौराणिक कथाओं की वजह से विख्यात हैं.

वाल्मिकी रामायण के अनुसार मिथिला के राजा जनक एक बार भीषण अकाल पड़ने पर पुरोहितों के सलाह के अनुसार यहां हल से खेत जोत रहे थे. इसी दौरान उन्हें धरती से एक पात्र मिला जिसमें शैशवावस्था में एक कन्या थी. राजा जनक उस कन्या को अपने घर जनकपुर ले गए और सीता का नाम दिया. जनकपुर अभी नेपाल में है. इसलिए सीता को वाल्मिकी रामायण में जानकी कहा गया है.

उनका विवाह स्वयंवर के दौरान अयोध्या नरेश राजा दशरथ के पुत्र व मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के साथ हुआ. जैसे श्रीराम को पुरुषों में उत्तम कहा जाता है, उसी तरह सीता भी अपने त्याग व असाधारण पतिव्रता के कारण नारियों में सबसे उत्तम मानी जाती हैं. वाल्मिकी रामायण के अनुसार सीता का चरित्र अदम्य साहसिक, संयमित व आत्मविश्वासी था. पुनौरा के आसपास राजा जनक व जनक नंदिनी से जुड़े अन्य तीर्थस्थल भी हैं. शहर से आठ किलोमीटर की दूरी पर पंथपाकड़ गांव भी जानकी से जुड़ा हुआ है.

कहा जाता है कि विवाह के बाद अयोध्या जाने के रास्ते में श्रीराम के काफिले ने यहां रात्रि विश्राम किया था. माता सीता ने यहां पाकड़ के दातून से दांत साफ कर उसे फेंक दिया था जिससे पाकड़ के एक विशालकाय वृक्ष की उत्पत्ति हुई. कालांतर में यहां पाकड़ के कई पेड़ हो गए. यहां एक तालाब भी है. ऐसी मान्यता है कि इस जगह पर किसी भी तरह के विवादों का सहज निपटारा हो जाता है और पाकड़ के पत्तों को पीस कर गर्भवती महिलाओं को पिलाने से उन्हें प्रसव पीड़ा से मुक्ति मिलती है.

मां जानकी के मंदिर निर्माण के साथ श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के सदस्य कामेश्वर चौपाल ने यह भी दावा किया है कि वर्ष 2023 के अंत तक अयोध्या में प्रभु श्रीराम का मंदिर बनकर तैयार हो जाएगा और गर्भ गृह में रामलला विराजमान हो जाएंगे. कामेश्वर चौपाल यह बताते हैं कि मंदिर निर्माण में बहुत तेजी लाई गई है और 24 घंटे काम चल रहा है. मंदिर निर्माण की नींव भराई के 44 लेयर में आधा काम पूरा हो चुका है. अक्टूबर महीने तक नींव भराई का काम पूरा हो जाएगा. उसके आगे के काम के लिए पत्थरों को तराशने से लेकर उसे मंदिर निर्माण स्थल तक पहुंचाने का काम जारी है. 36 महीने के अंदर मंदिर बनाने का लक्ष्य रखा गया था. कोरोना संक्रमण के कारण काम में बाधाएं आईं. उसके बावजूद 2023 तक मंदिर निर्माण का कार्य पूरा कर लिया जाएगा.

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