इस मंदिर में मौजूद है भगवान विष्णु के पैरों की छाप, पिंडदान से पितरों को मिलती है मोक्ष की प्राप्ति

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बिहार के कई प्राचीन और एतिहासिक मंदिरों में से एक है विष्णुपद मंदिर जो बिहार के गया शहर में मौजूद है। गया जंक्शन रेलवे स्टेशन से 4 किमी और बोधगया बस स्टेशन से 10 किमी की दूरी पर विष्णुपद मंदिर स्थित है। यह मंदिर गया के प्राचीन मंदिरों में से एक है। फाल्गु नदी के तट पर स्थित विष्णुपद मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है। ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार विष्णुपद मंदिर का अस्तित्व समुद्रगुप्त के काल से है जिनका 5 वीं शताब्दी में विशाल साम्राज्य था। शिलालेख में राजा को भगवान विष्णु के भक्त के रूप में वर्णित किया गया है।

कहा जाता है कि विष्णुपद मंदिर वही स्थान है जहां भगवान विष्णु ने गयासुर के शरीर पर अपने पैर रखकर उसे दबाया था जिससे चट्टानी सतह पर उनके पैरों की छाप रह गई थी। पौराणिक कथा के अनुसार गयासुर नाम के एक राक्षस ने घोर तपस्या के बाद वरदान प्राप्त किया था। वरदान के अनुसार जो कोई भी उनकी ओर देखता उसे मोक्ष की प्राप्ति हो जाती। इस वजह से कर्म और उसके प्रभाव की अवधारणा बेमानी होती जा रही थी। इसे रोकने के लिए भगवान विष्णु ने गयासुर को अपनी छाती पर पैर रखकर पृथ्वी की सतह से नीचे धकेल दिया। ‘

लोग अपने प्रियजनों का ‘पिंड-दान’ करने के लिए यहां जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि जिस दिन गयासुर को अपना भोजन नहीं मिलेगा, वह दिन उसकी दुनिया में वापसी का दिन होगा। मंदिर में 40 सेंटीमीटर लंबाई वाले भगवान के पैर की छाप दिखाई देती है और तीर्थयात्री रोजाना इसकी पूजा करते हैं। मंदिर में भगवान विष्णु के लगभग 40 सेंटीमीटर लंबे पदचिह्न हैं जिन्हें धर्मशिला के नाम से जाना जाता है जो चांदी की प्लेटों से बने बेसिन से घिरा हुआ

इस पदचिह्न में विभिन्न प्रतीक भी हैं जो भगवान विष्णु के शंख, चक्र और गदा जैसे गुणों से जुड़े हैं। इसके अलावा मंदिर में भगवान नरसिंह और भगवान शिव का भी मंदिर है। पितृपक्ष के महीने में मंदिर परिसर में एक विशेष मेला लगता है। पितृपक्ष एक ऐसा समय है जब हिंदू अपने पूर्वजों को विशेष रूप से भोजन प्रसाद के साथ सम्मान देते हैं। पितृपक्ष के दौरान परिवार के सदस्यों द्वारा अपने पूर्वजों का पिंडदान करना फलदायी होता है।

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