IPS विकास वैभव आ रहे हैं सासाराम, रोहतास फोर्ट से उग्रवादियों को भगा फहराया था तिरंगा

खबरें बिहार की

पटना : बिहार के सबसे एक्टिव माने जाने वाले आईपीएस अधिकारियों में शामिल विकास वैभव संडे 17 सितंबर को सासाराम पहुंच रहे हैं . वे अभी भागलपुर और मुंगेर रेंज के डीआईजी हैं . वैभव की रोहतास यात्रा को लेकर सासाराम में बड़ी चर्चा है . स्वयं विकास वैभव भी उत्साहित हैं और इस बारे में उन्होंने बहुत कुछ लिखा है।

साल 2008 में अगस्त माह से फरवरी 2011 तक विकास वैभव रोहतास के एसपी थे . तब रोहतास परेशान था . उग्रवादी गतिविधियों की मार झेल रहा था . लेकिन तीन साल से भी कम के अपने कार्यकाल में उन्होंने रोहतास में जो कार्य किया,आज भी जिले के जनमन में है . सो,जब रोहतास जिले का अपना वेबसाइट बना है,तो उद्धघाटन समारोह में विकास वैभव को आमंत्रित किया गया है ।

रोहतास के आमंत्रण को लेकर स्वयं विकास वैभव कितने आनंदित हैं,यह उनके फ़ेसबुक पोस्ट से जाहिर होता है . आगे उनके ही शब्दों में  फेसबुक पोस्ट को पढ़ें-

‘भागलपुर से मुंगेर की #यात्रा कर रहा हूँ . परंतु मन रोहतास की स्मृतियों में डूबा सा है . चूंकि इस रविवार को आयोजित रोहतास डिस्ट्रिक्ट वेबसाईट के उद्धाटन कार्यक्रम में सहभागिता हेतु वर्षों पश्चात रोहतास पुनः जाने की योजना है . फरवरी 2011 में स्थानांतरण के पश्चात रोहतास को पुनः देखने का मेरे लिए यह प्रथम अवसर होगा, अतः यात्री मन अत्यंत उत्साहित होने के साथ ही पूर्व स्मृतियों में खोता सा जा रहा है . मानस पटल पर पुलिस अधीक्षक, रोहतास के रूप में अगस्त, 2008 से फरवरी, 2011 तक उन ढाई वर्षों के कार्यकाल के दौरान संजोयी हुई स्मृतियाँ लगातार उभर रही हैं ।

पुलिस अधीक्षक, रोहतास के रूप में जब 4 अगस्त, 2008 को मैंने प्रभार लिया था, तब क्षेत्र उग्रवादियों की विध्वंसक गतिविधियों का दंश झेलता सा प्रतीत होता था . हर तरफ एक अनिश्चित का भय सा विद्यमान था जिससे पुलिस और आमजन भी पूर्णतः प्रभावित प्रतीत होते थे  . तब रोहतास के ऐतिहासिक महत्व के बारे में मैं बहुत कम जानता था परंतु इससे अवश्य अवगत था कि मध्य युग में सासाराम में ही पले-बढे शेर शाह सूरी ने कभी भारत का नेतृत्व किया था और यह कि उसके पूर्व इस क्षेत्र में पूर्ववर्ती प्राचीन अन्य यशस्वी राजाओं का प्रभाव था जिनके राज्य का केंद्र ऊंचे पर्वत पर अवस्थित रोहतास का विशाल दुर्ग था जो कालांतर में अत्यंत उपेक्षित होकर वर्तमान में कभी दस्युओं तो कभी उग्रवादियों की आश्रयणी का रूप ले मुख्यधारा से कट चुका था ।

योगदान के तुरंत बाद जब मैंने क्षेत्र की भौगोलिक बनावट को समझने का प्रयास किया तब यह पाया कि जिले का लगभग एक तिहाई भाग वनों से आच्छादित और ऊंचे पर्वत पर अवस्थित था जहाँ पक्के मार्गों के अभाव में और कच्चे मार्गों में विस्फोटक बिछे रहने की संभावना के कारण पुलिस की गतिविधियाँ लगभग नगण्य थीं . इसके कारण क्षेत्र के पूर्ववर्ती गौरव का साक्षात् प्रतीकरूप रोहतास दुर्ग भी अत्यंत उपेक्षित और भयाक्रांत था और पहाड़ी क्षेत्रों की जनता मुख्यधारा से कट चुकी थी . मुझे यह भी ज्ञात हुआ कि वर्षों से रोहतास दुर्ग पर राष्ट्रीय पर्वों के अवसर पर काले झंडे फहर रहे थे और कई ग्रामवासीयों ने प्रजातंत्र के स्रोत अपने मताधिकार का प्रयोग भी दशकों से नही किया था ।

ऐसी विषम परिस्थितियों में क्षेत्र के परिवर्तन हेतु एक माध्यम रूप में कार्य हेतु मन पूर्णतः संकल्पित था और हर त्याग के लिए तत्पर था . परिवर्तन के लिए क्षेत्र की भौगोलिक बनावट और ऐतिहासिक सभ्यता को समझना आवश्यक था, अतः योगदान के 4 दिवस पश्चात ही सर्वप्रथम मैं रोहतास दुर्ग पर चढा जिसके लिए लगभग 7 किमी की पैदल यात्रा करनी पड़ती थी . 1500 फीट की ऊंचाई पर स्थित 34 किमी की परिधि वाले इस सुदृढ़ एवं सशक्त ऐतिहासिक दुर्ग पर पहुंचने के 4 मुख्य पहाड़ी रास्ते हैं . दुर्ग पर पहुंचकर जब यात्री सभी तरफ की घाटियों और महानद शोणभद्र (सोन) के विस्तार को देखता है तब मध्यकाल में इसके भारत के सबसे शक्तिशाली दुर्गरूप में फरिश्ता एवं अन्य लेखकों के वर्णन का मर्म स्पष्ट प्रतीत होता हैं ।

दुर्ग पर पहुंचकर रोहितासन मंदिर के दर्शनोपरांत जब स्थानीय लोगों से बातचीत हुई तब पता चला कि उग्रवादी दस्ता पुलिस को आते देखकर कुछ समय पूर्व ही वहाँ से वन में प्रस्थान कर गया था . और बातें करने पर अपने आप को पौराणिक राजा हरीशचंद्र के पुत्र रोहिताश्व के क्षत्रिय्र वंशज मानने वाले खरवार और ऊराँव जनजाति के लोगों ने दुर्ग को अपना पारंपरिक उद्गम स्थल बताया जहाँ कालांतर में उनके राज्य का पतन अनेकानेक कारणों से हुआ था . यह भी ज्ञात हुआ कि दुर्ग पर स्थित “करम” के वृक्षों को उराँव अत्याधिक पूज्य मानते थे और दुर्ग के इतिहास के विषय में अनेक लोकगीत प्रचलित थे . इन बातों से मेरी जिज्ञासा में अत्यंत वृद्धि हुई और बाद में मैंने बुकानन और अन्य लेखकों समेत जिला गैजेटियर का विस्तृत अध्ययन भी किया ।

पहले माह में पूरे क्षेत्र की भौगोलिक बनावट समझने हेतु अत्यंत जोखिम लेकर भी अत्याधिक भ्रमण करके मैंने विस्तार से देखा . इसी समय 3, सितम्बर को सोली स्थित विद्यालय के भ्रमण के दौरान #जंगल में अत्यंत नजदीकी मुठभेड़ हुई जिसके विषय में मैंने पूर्व में हिंदी में अनुवादित आलेख FireAndTheForest ( http://copinbihar.blogspot.com/2016/08/blog-post.html ) में विस्तार से CopInBihar पर लिखा है . कुछ माह पर्वतों और वनों में चले आॅपरेशन विध्वंस तथा वनवासियों से साक्षात्कार करते अत्याधिक भ्रमण और मुठभेड़ों के पश्चात मैंने यह पाया कि यदि ऐसा ही क्रम चलता रहेगा तो परिवर्तन नहीं होगा और अघोषित युद्ध क्षेत्र को ग्रसित कर विकास के मार्ग को अवरुद्ध करती रहेगी .  क्षेत्र में परिवर्तन के लिए क्षेत्र की जनता का योगदान आवश्यक था और माहौल बनाने के लिए पुलिस को एक सशक्त माध्यम के रूप में कार्य करना था और भूमिका में परिवर्तन लाना था ।

मैंने बगहा के अपने पूर्व कार्यकाल में इतिहास को सूत्र बनाकर सामाजिक परिवर्तन होते साक्षात् देखा था जहाँ नियमित पुलिसिंग से जो समस्याएं नहीं सुलझ रही थीं, वे इतिहास के माध्यम से प्रेरित हुए समाज के योगदान से सुलझ सकीं . बगहा में जब पुलिस की नित्य छापेमारी एवं अन्य कार्यवाही जिसमें मुख्य रूप से दस्यु गिरोहों द्वारा लगाए गए अवैध गन्ने की फसल को लक्षित करके जब पुलिस द्वारा जब्त कर सरकारी खजाने में जमा कराया जाने लगा, तब प्रभावी रूप में दस्यु गिरोहों की आर्थिक रीढ़ अवश्य टूट गयी, परन्तु व्यापक और प्रभावी परिवर्तन तब संभव हो सका जब दस्युओं के परिवारों से संपर्क साधकर उन्हें महर्षि वाल्मीकि के सुधरने की कथा से प्रेरित किया जाने लगा . चूंकि वाल्मीकि उसी क्षेत्र के माने जाते थे, अतः समाज भी एकजुट होकर मुख्यधारा से भटके अपराधियों को आत्मसमर्पण करने हेतु प्रेरित करने लगा . दूरगामी असर ऐसा हुआ की 25 से अधिक की संख्या में अपराधियों द्वारा पुलिस के समक्ष सशस्त्र आत्मसमर्पण किया गया और क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित हुई ।

रोहतास में सोन महोत्सव नाम से एक विशाल सांस्कृतिक आयोजन की तब मैंने परिकल्पना की . सामुदायिक पुलिसिंग के निमित्त आयोजित इस व्यवस्था में क्षेत्र के लोगों और विशेषकर बुद्धिजीवियों का अत्याधिक समर्थन मिलता गया और धीरे-धीरे सुदूर ग्रामों के निवासियों की भागीदारी सुनिश्चित की गयी . इन कार्यक्रमों में एक तरफ जहाँ पुलिस द्वारा कम्बल बांटने, इलाज कराने, खेल कूद इत्यादि के कार्यक्रम सुदूर उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में आयोजित किये जाते थे वहीँ क्षेत्र में लोगों को अपने इतिहास से सीख लेने और शांति स्थापित कर उज्जवल भविष्य निर्माण हेतु प्रेरित किया जाता था . इस बात पर विशेष चर्चा की जाती थी कि जिस क्षेत्र के यशस्वी पूर्वजों ने इतिहास में परमोत्कर्ष प्राप्त करते हुए ऊँचे पर्वत पर रोहतास दुर्ग जैसे स्थापत्य का निर्माण किया उनके वंशजों के काल में कैसे वही क्षेत्र शांति के अभाव में विकास की मुख्य धरा से कट गया . इतिहास पर परिचर्चा समेत अनेकानेक कार्यक्रमों जैसे पर्यटक गाइड के प्रशिक्षण इत्यादि का यह असर हुआ कि रोहतास दुर्ग को अपना उद्गम स्थल मानने वाले ऊराँव एवं खरवार जनजातियों ने खुलकर क्षेत्र में अशांति फैला रहे उग्रवादियों के विरुद्ध शंखनाद कर दिया जिसने अंततः स्थायी शांति का बीजारोपण किया .
पूर्व में इस परिवर्तन के बारे में भी मैंने ब्लॉग पर WindsOfChange (http://copinbihar.blogspot.in/2016/07/a-story-of-change-in-forest-with-fort.html ) नामक आलेख साझा किया था ।

रोहतास से स्थानांतरित होने के बाद भी उन वर्षों में जो साथ जुड़े थे उनसे जुड़ाव कभी कम नहीं हुआ . दिल्ली पदस्थापन के दौरान भी रोहतासवासियों से नित्य मिलन का क्रम जारी ही रहा और पटना में तो और बढ गया . पुनः जाने की इच्छा मन बहुत वर्षों से संजोए था पर अवसर नहीं मिल पा रहा था . पिछले माह जब रोहतास से निमंत्रण लेकर आए अखिलेश जी और प्रिय अंकित वर्मा से मुंगेर कार्यालय में भेंट हुई तब ही मैंने अवकाश लेकर कार्यक्रम में सम्मिलित होने का निर्णय लिया . सौभाग्य से याचित अवकाश स्वीकृत हो गई है और अब शीघ्र रोहतास पहुंचने के लिए मन स्मृतियों के साथ अत्यंत उत्साहित है ।

Leave a Reply

Your email address will not be published.