गया के इंटरनेशनल तिलकुट की कहानी, पारम्परिक मिष्ठान की है अपनी एक अलग पहचान

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उत्तर भारत की सांस्कृतिक नगरी गया स्थानीय मिठाइयों के लिए पूरी दुनिया में मशहूर रही है। बरसात में ‘अनारसा’, गर्मी में ‘लाई’ और जाड़े में ‘तिलकुट’, इन सबमें गया की अलग विशेषता है। गया में तिलकुट की मुख्य मंडी रमना और टिकारी रोड में है, जहां खरीददारी करने के लिए देश के कोने-कोने से लोग आते हैं।

मकर संक्रांति के एक महीने पहले से ही गया की सड़कों पर तिलकुट की सोंधी महक और तिल कूटने की धम-धम की आवाज लोगों के जेहन में इस पर्व की याद दिला देती है। पर्व के एक से डेढ़ महीने पूर्व से यहां तिलकुट बनाने का काम शुरू हो जाता है।

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हिंदू धर्म में मान्यता है कि मकर संक्राति के दिन तिल खाने से पुण्य मिलता है। गया में तिलकुट बनाने की परंपरा की शुरुआत कब हुई, इसका कोई प्रमाण तो नहीं है, लेकिन आम धारणा है कि धर्म नगरी गया में सदियों पूर्व तिलकुट बनाने का कार्य प्रारंभ हुआ था। भगवान बुद्ध की ज्ञानस्थली के रूप में मशहूर और हिंदुओं के प्रमुख मोक्षधाम में हाथ से कूटकर बनाए जाने वाले तिलकुट की क्वालिटी बहुत खास होती है। यहां तैयार होने वाला तिलकुट, खस्ता जैसा होता है, जो छूते ही टूट जाता है। गया के तिलकुट की विशेषता पूछने पर स्थानीय लोग दावा करते हैं कि इससे अच्छा तिलकुट कहीं का नहीं है।

रमना मुहल्ले में सबसे पहले बना था तिलकुट
गया के प्रसिद्ध तिलकुट प्रतिष्ठान श्रीराम भंडार के एक बुजुर्ग कारीगर रामेश्वर का कहना है कि गया के रमना मुहल्ले में सबसे पहले तिलकुट निर्माण का कार्य प्रारंभ हुआ था। वैसे अब टेकारी रोड, कोयरीबारी, स्टेशन रोड सहित कई इलाकों में कारीगर हाथ से कूटकर तिलकुट का निर्माण करते हैं। रमना रोड और टेकारी के कारीगरों द्वारा बने तिलकुट बेहद लजीज होते हैं। वे बताते हैं कि कुछ ऐसे परिवार भी गया में हैं, जिनका यह खानदानी पेशा बन गया है।

गया के तिलकुट के मुरीद हैं ये शहर व देश
गया में निर्मित तिलकुट और उसके स्वाद का मुकाबला कहीं नहीं है। यहां के तिलकुट के स्वाद का जोड़ कहीं नहीं है। यही वजह है कि गया में निर्मित तिलकुट झारखंड, उतर प्रदेश, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, दिल्ली, महाराष्ट्र सहित पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल सहित आसपास के कई देशों में सप्लाई होता है। गया आने-जाने वाले लोग यहां के तिलकुट का स्वाद जरूर लेते हैं और अपने दूर-दराज के रिश्तेदारों के लिए भी तिलकुट ले जाते हैं। बताया जाता है कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी गया के तिलकुट की मुरीद थीं। गया में तिलकुट खाने के बाद एक बार उन्होंने कहा था कि ऐसी मिठाई उन्होंने कहीं नहीं खायी।

तिलकुट का व्यवसाय
इस व्यवसाय से जुड़े लोग बताते है कि तिल और चीनी से तिलकुट का निमार्ण किया जाता है। इसके लिए एक निश्चित मात्रा में तिल और चीनी के मिश्रण को कोयले की आग पर निश्चित समय सीमा तक मिलाया जाता है। इसके बाद एक निश्चित समय तक इसे कूटा जाता है। यहां गुड़ के तिलकुट भी बनाए जाते हैं।

इसके बाद लजीज और जायकेदार खस्ता तिलकुट खाने के लिए तैयार होता है। मिश्रण और कूटने की प्रक्रिया में थोड़ी भी गड़बड़ी, इसके स्वाद को चौपट कर सकती है। गया में मिलने वाले तिलकुट की कई किस्में हैं। मावेदार तिलकुट, खोया तिलकुट, चीनी तिलकुट और गुड़ तिलकुट बाजार में मिलते हैं। पांरपरिक तरीके से इन तिलकुटों को बनाने में काफी समय और मेहनत लगती है।

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ये हैं वैज्ञानिक फायदे

  • तिलकुट की तासिर गर्म होती है, इसलिए ठंड के मौसम में इसकी मांग बढ़ जाती है।
  • यह आयुर्वेदिक दवा का भी काम करता है।
  • तिलकुट खाने से कब्ज जैसी समस्या नहीं होती है ।
  • यह पाचन क्रिया को भी बढ़ाता है।

वैसे तो पूरे देश में कई जगहों पर तिलकुट का व्यवसाय होता है, लेकिन गया में निर्मित तिलकुट और उसके स्वाद का मुकाबला कहीं नहीं है।

Sources:-Dainik Jagran

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