रोहतास के दुर्गम पहाड़ी गांव में शिक्षा की रोशनी बिखेर रहा है ‘पहल’, यहाँ राज्यपाल भी जाने की जता चुके हैं इच्क्षा

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पटना: नक्सलियों के आगोश वाले पहाड़ी इलाकों के आदिवासी बच्चों को शिक्षा की राह पर ले जाने में मील का पत्थर साबित हो रहा है पहल. जिला मुख्यालय सासाराम से 130 किमी. सुदूर दक्षिण कैमूर के जंगल और सोन नदी के किनारे बेहद दुर्गम इलाके में स्थित डुमरखोह गाँव में समाजिक संस्था पहल आदिवासी बच्चों को मुख्य धारा में का काम कर रहा है.

विदित हो कि आदिवासी बहुल आर्थिक रूप से काफी कमजोर और सुविधा विहीन इस गांव के बच्चों के बीच अजादी के 70 वर्षों बाद भी किसी सरकारी या निजी स्तर पर शिक्षा को बढ़ावा देने हेतु कोई प्रयास नहीं किया गया. ऐसे में डुमरखोह गाँव में ‘पहल’ ने शिक्षा की लौ जलाने का एक प्रयास शुरू किया. डुमरखोह गांव में पांचवी कक्षा तक के बच्चों को पहल से जुड़ी प्रभा चेरो उसी स्थान पर पेड़ के नीचे पढ़ातीं हैं, जहां कभी नक्सली जन अदालत लगाते थे.

सुबह 9 बजे छात्र प्रभा मैडम के लिए अत्यंत पुरानी लकड़ी की एक कुर्सी लाकर पेड़ के नीचे रखते हैं और उनकी कक्षा शुरू हो जाती है. नीचे जमीन पर प्लास्टिक के बोरे बिछाकर बैठ अपनी टीचर प्रभा मैडम से सबक सीखते हैं. बता दें कि, प्रभा की शादी गांव के पुनेंद्र चेरो से हुई है. प्रभा अपने मायके कैमुर पहाड़ी से सटे आलमपुर से इंटरस्तरीय कॉलेज से पढ़ी हैं. प्रभा चेरो बताती हैं कि, शादी के बाद शिक्षा से वंचित ससुराल में ‘पहल’ के प्रयास से यह पाठशाला शुरू हुई.

वहीं गाँव में पांच किमी. के दायरे में कोई स्कूल नहीं है. सदर अस्पताल, सासाराम की दूरी गांव डुमरखोह से 130 किलोमीटर है. समीप के उत्तर प्रदेश राज्य के सोनभद्र जिले की सीमा यहां से पांच किमी की दूरी पर है. झारखंड की सीमा भी सोन नदी पार करीब पांच किमी है. तीनों राज्यों की सीमा पर मौजूद इस गांव के चारो तरफ पांच किलोमीटर के दायरे में ना तो कोई स्कूल है और न ही कोई अस्पताल।

डुमरखोह गाँव में ‘पहल’ की इस पहल से बच्चों में शिक्षा के प्रति रुझान बढ़ा है. बच्चों को शिक्षा के साथ अपनी संस्कृति व संस्कार का भी ज्ञान दिया जा रहा है. माह में एक बार पहल अध्यक्ष अखिलेश कुमार द्वारा यहाँ बैठक की जाती है. जिसमें पठन-पाठन से संबंधित जानकारी उपलब्ध कराई जाती.

डुमरखोह के ग्रामीण रामचंद्र चेरो, श्रीमंगल चेरों, शैलेन्द्र चेरो, केदार यादव, पुनेंद्र चेरो बताते हैं कि पहल संस्था ने लगभग 15 अगस्त 2015 में यह स्कूल शुरू किया था. संस्था के संचालक अखिलेश कुमार सहित अन्य सहयोगी जब भी यहां पहुंचते हैं तो बच्चों के लिए स्कूल बैग, किताब और ड्रेस लेकर आते हैं. उनके आने पर गांव में उत्सव-सा  माहौल हो जाता है. स्कूल के संचालन में ग्रामीण भी बढचढ़ कर भाग लेते हैं.

पहल के अध्यक्ष अखिलेश कुमार बताते हैं कि 21वीं सदी में लोग आश्चर्यचकित हैं इस व्यवस्था को देख कर. संस्था के लोग जब अपनी कार से गांव में पहुंचे तो उसे देखने के लिए बुजुर्गों की भीड़ लग जाती है. पहली बार कई ऐसे बुजुर्ग मिले जिन्होंने जीवन में पहली बार ही कार देखी. वर्षो पहले वहां पुलिस की जीपें और लैंड माइंस निरोधक गाड़ियां ही पहुंचती रहीं हैं, वह भी कभी-कभी. उन्होंने कहा कि, हमें बहुत आत्मग्लानि होती थी जब देखते थे कि बच्चें सही जानकारी और मार्गदर्शन के अभाव में भटक रहे है. ऐसे में पहल ने यहाँ पर शिक्षा की अलख जगाना शुरू कर किया.

आपको जान कर खुशी होगी कि सूबे के राज्यपाल सत्यपाल मलिक डुमरखोह जाने की इच्क्षा जता चुके है. इस संबंध में अध्यक्ष अखिलेश कुमार ने बताया कि, जून माह में पटना के रविन्द्र भवन सभागार में पहल द्वारा आयोजित श्रेयसी सिंह सम्मान समारोह में जब इस विद्यालय की चर्चा चली तो राज्यपाल महोदय ने कहा कि रोहतास जिले में जब भी मेरी यात्रा होगी मै डुमरखोह के उन बच्चों से मिलने जरुर चलूंगा, जो आपके द्वारा संचालित विद्यालय में शिक्षा ग्रहण कर रहे है.

Source: Rohtas District

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