याराना हो तो ऐसा… ट्रैन छूटने के कारण नहीं बन सके इंजीनियर, एक बना IFS, दूसरा IAS और तीसरा IRTS

जिंदगी

पटना: याराना हो तो ऐसा। पटना के एक स्कूल में पढ़ाई के दौरान तीन छात्र दोस्त बने। तीनों छात्रों के पिता संयोग से इंजीनियर थे। वे भी इंजीनियर बनना चाहते थे। तीनों को इंजीनियरिंग की परीक्षा देने पटना से बाहर जाना था। तीनों को एक ही ट्रेन से यात्रा करनी थी। लेकिन संयोग कुछ ऐसा हुआ कि उन्हें स्टेशन पहुंचने में देर हो गयी। जब तक वे प्लेटफॉर्म पर पहुंचते उनकी ट्रेन खुल चुकी थी। ट्रेन छूटने का उन्हें बेहद अफसोस हुआ।

तीनों पढ़ने में बहुत तेज थे। सपने टूटने की कसक भी हुई। लेकिन उन्होंने उसी समय फैसला कर लिया कि अब इंजीनियर नहीं बनना है। आगे पढ़ाई कर सिविल सर्विसेज परीक्षा पास करने का इरादा पक्का कर लिया। तीनों अपने इरादे में सफल हुए। एक दोस्त IFS , दूसरा IAS और तीसरा IRTC के लिए चुना गया।

ये कहानी है पटना के तीन दोस्तों की। अरुण कुमार सिंह, अफजल अमानुल्ला और कुंदन सिन्हा पटना के संत माइकल स्कूल में एक साथ पढ़ते थे। जब ट्रेन छूट जाने के कारण उनके इंजीनियर बनने के सपना टूट गया तो ये तीनों ग्रेजुएशन की पढ़ाई के लिए दिल्ली चले गये।

अरुण कुमार सिंह ने दिल्ली यूनिवर्सिटी में इकॉनोमिक्स ऑनर्स में दाखिला लिया। एम ए करने के बाद वे दो साल तक दिल्ली यूनिवर्सिटी में लेक्चरर रहे। 1979 में उनका चयन भारतीय विदेश सेवा के लिए हुआ। UPSC की मेरिट लिस्ट में उनका स्थान चौथा था।

अफजल अमानुल्ला ने दिल्ली आने के बाद सेंट स्टीफेंस कॉलेज में दाखिला लिया। उन्होंने इकॉनोमिक्स से ग्रेजुएशन किया। फिर दिल्ली स्कूल इकॉनोमिक्स से एम ए किया। 1979 में वे भारतीय प्रशासनिक सेवा के लिए चुने गये। तीसरे दोस्त कुंदन सिन्हा की किस्मत भी 1979 में ही मेहरबान हुई। वे इंडियन रेलवे टेरिफ सर्विसेज (IRTC) के लिए चुने गये।

अरुण कुमार सिंह कई देशों में राजदूत रहे। 2015 में नरेन्द्र मोदी की सरकार ने उन्हें अमेरिका का राजदूत बना कर एक बड़ी जिम्मवारी दी थी। संयुक्त बिहार में मुचकुंद दूबे के बाद इस प्रतिष्ठित पद पर जाने वाले वे दूसरे बिहारी बने। अमेरिका का राजदूत होना राजनयिक रूप से बड़ी जिम्मेवारी मानी जाती है। सरकार सबसे काबिल अफसर को ही इस पद पर तैनात करती है। विदेश नीति के हिसाब से सरकार का ये बड़ा फैसला होता है। अफजल अमानुल्ला बिहार के चर्चित IAS अफसर रहे हैं। वे बिहार के गृह सचिव भी बने।

कुंदन सिन्हा भी रेलवे के काबिल अफसर बने। विलासपुर रिजन के DRM बने। फिर वे रोलवे बोर्ड के सदस्य भी चुने गये।स्कूल के इन तीन दोस्तों की किस्मत देखिए कि वे एक ही साल (1979) भारत की उच्च सेवा के लिए चुने गये। ट्रेन छूटने की घटना ने इन तीन दोस्तों की जिंदगी में एक नया मोड़ पैदा कर दिया। अगर ट्रेन मिल जाती और वे इंजीनियरिंग की परीक्षा पास कर जाते तो उनकी भूमिका कुछ अलग ही होती। लेकिन तकदीर ने उनके लिए कुछ खास तय कर रखा था। एक दिन उनकी ट्रेन तो छूट गयी लेकिन एक नयी मंजिल के लिए रास्ता भी खुल गया।

Source: live bihar

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