क्यों पापा की लाडली होती हैं बेटियां – एक पिता के जीवन में बेटी का महत्व!

प्रेरणादायक

आपकी तो आप जानें, मुझे तो बहुत प्यारी लगती हैं बेटियां। जब आप आफिस से थके-हारे घर लौटते हैं, देखते ही भागी चली आती हैं और सीधे गोद में आ विराजती हैं। ‘पापू…पापू हमाये लिए क्या लाए हो? पापू हमको दूछली गुलिया लेनी है।’ और आप कहते हैं, ‘अरे बेटा, अभी कुछ दिन पहले ही तो लाया था, गुड़िया।’ लेकिन वह ठुनकते हुए मचलती है, ‘अले पापू आप छमत्ते क्यों नहीं? उछकी नाक तो तूत गई है, ओल कल उछकी छादी भी कन्नी है।’ कभी वह पीछे से आकर आपकी गरदन पर झूल जाती है, ‘डैडी हमको टोपी लेनी है, और तोकलेट भी। बीया छब खा जाता है, हमको नहीं देता।’ और इस तरह आपके दिन भर की थकान उतर जाती है। भला ये बेटियां किसे प्यारी नहीं लगेंगी!

पढ़ाई के साथ-साथ ये घर के कामों में भी अपनी मां का साथ यों देती हैं कि कुछ मत पूछिए। अगर मां बीमार पड़ जाए, तो भी घर की व्यवस्था यथावत चलती रहती है। और अगर आप बीमार पड़ जाएं, तो ये सेवा में ऐसे जुटती हैं कि आपको भला-चंगा करके ही दम लेती हैं। इतना ही नहीं, आजकल तो पढ़-लिखकर बेटियां बेटों की तरह घर भी संभालने लगी हैं।

अपनी बिटिया के लिए उपयुक्त वर खोजने में आपकी कई चप्पलें घिस जाती हैं। आपने बिटिया को इंजीनियर-डॉक्टर बना दिया, फिर भी लड़के वाले पूछते हैं कि आपका ‘एस्टीमेट’ क्या है? और बताने पर नाक-भौं सिकोड़ते हैं। बिटिया जब ससुराल विदा होती है, तो आप कोई एकांत खोजते हैं, ताकि कोई आपको रोता हुआ ना देख सके। आपको पता है कि कन्यादान से बड़ा और कोई दूसरा दान नहीं होता। बेटियां फिर भी बहुत प्यारी लगती हैं।

ससुराल से सजी-धजी बिटिया जब आपके घर आती है, गोद में एक प्यारा-सा धेवता लाती है, तो आप उसे खिला-खिलाकर निहाल हो जाते हैं। कन्या शिशु को गर्भ में ही रफा-दफा करवाने वाले तथा जन्म लेते ही बेटियों को मार देने वालों को भले ही यह पोस्ट नहीं भाएगा, मगर इस पुरुष प्रधान समाज में भी मुझे बेटियां अधिक प्यारी लगती हैं, बेटों की अपेक्षा!

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