यहां विशाल है शिवलिंग का आकार, चंदेल राजपूतों ने कराया था मंदिर का निर्माण

आस्था

 मतंगेश्वर महादेव का मंदिर खजुराहो के उन मंदिरों में है जिसमें नियमित पूजा होती है। शिव के इस मंदिर में कई हजार सालों से नियमित पूजा होती चली आ रही है।बाकी के मंदिरों में नियमित पूजा पाठ नहीं होता। मतंगेश्वर महादेव का यह मंदिर खजुराहो में पश्चिमी मंदिर समूह के ठीक बगल में है। सुबह- शाम स्थानीय लोग बड़ी श्रद्धा से पूजा करने पहुंचते हैं। मतंगेश्वर मंदिर खजुराहो के उन मंदिरों में शामिल है जिसमें काम कला की मूर्तियां नहीं उकेरी गई हैं।

 

लक्ष्मण मंदिर के पास स्थित यह मंदिर 35 फीट के वर्गाकार दायरे में है। इसका गर्भगृह भी वर्गाकार है। प्रवेश द्वार पूरब की ओर है। मंदिर का शिखर बहुमंजिला है। इसका निर्माण काल 900 से 925 ई. के आस-पास का माना जाता है। चंदेल शासक हर्षदेव के काल में इस मंदिर का निर्माण हुआ।
मंदिर के गर्भगृह में विशाल शिवलिंग है जो 8.5 फीट ऊंचा है। इसका घेरा तकरीबन 4 फीट का है। इस शिवलिंग को मृत्युंजय महादेव के नाम से भी लोग जानते हैं।
इस शिवलिंग के बारे में कहा जाता है कि यह शिवलिंग जितना जमीन से उपर दिखाई देता है, उससे ज्यादा यह जमीन में भी दबा हुआ है। लोग बताते हैं कि राजा चंद्रदेव को अपने राज्य की सुरक्षा के लिए एक मरकत मणि मिली थी, जो इस शिवलिंग के नीचे दबी हुई है।
मतंगेश्वर मंदिर त्रिरथ प्रकृति का है। मंदिर का गलियारे में फूलों और प्रसाद की एक दो दुकानें नजर आती हैं। मंदिर के आसपास बतखों का झुंड विचरण करता रहता है।
मंदिर का परिसर बड़ा ही मनोरम है। मंदिर की कुर्सी इतनी ऊंची है कि पूजा करने वालों को 20 से ज्यादा सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। मंदिर को खार पत्थर से बनाया गया है।
मंदिर के स्तंभों का ऊपरी भाग कहीं- कहीं बेल-बूटों से सजाया गया है। ये खजुराहो का यह एकमात्र मंदिर है, जिसकी लगातार पूजा- अर्चना सदियों से चली आ रही है।
अरब यात्री इब्नबतूता ने भी इस मंदिर के बारे में लिखा था कि यहां पूजा होती थी। यहां के लोगों की ये भी मान्यता है कि खजुराहो ही वो स्थान है जहां भगवान शिव का विवाह देवी पार्वती के साथ संपन्न हुआ था।
मतंगेश्वर का एक अर्थ प्रेम का देवता भी होता है। यह मंदिर खजुराहो के सभी मंदिरों में सबसे पवित्र माना जाता है।

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