एेतिहासिक तीर्थ स्थल है लोहार्गल, पांडवों का हुआ था उद्धार

जानकारी

राजस्थान में शेखावाटी क्षेत्र के झुंझुनू जिले में अरावली पर्वतमालाओं के मध्य स्थित लोहार्गल एेतिहासिक महत्व का तीर्थ स्थल है. लोहार्गल का अर्थ है- वह स्थान जहां लोहा गल जाये. इस तीर्थ स्थल का गर्ग संहिता व पद्मपुराण में भी उल्लेख मिलता है. इसको सतयुग में ब्रहमऋद, त्रेतायुग में कान्तिकुई, द्वापर में शंखपुरी व कलयुग में लोहार्गल के नाम से पुकारा गया है.

इस स्थान के बारे में प्रचलित है कि महाभारत युद्ध के बाद पांडव अपने स्वजनों की हत्या के पाप से मुक्त होने के लिए भगवान श्री कृष्ण के निर्देश पर देश के सभी तीर्थ स्थलों के दर्शन को चल पड़े. कृष्ण ने पांडवों को बताया था कि जिस स्थान पर तुम्हारे अस्त्र शस्त्र पानी में गल जाये, वहां तुम लोग स्वजन हत्या के पाप से मुक्त हो जाओगे. देश के समस्त तीर्थ स्थानों का भ्रमण करने पर भी पांडवों को वांछित फल प्राप्त नहीं हो सका. उसी यात्रा के दौरान वे घूमते हुए लोहार्गल आए तथा यहां बने सुर्यकुंड के पवित्र जल मे स्नान किया. स्नान करते ही पांडवों के हथियार गल गये. इस पर पांडवों के हर्ष व आश्चर्य की सीमा नहीं रही, क्योंकि उन्हे वांछित लक्ष्य प्राप्त हो चुका था. उन्होंने इस स्थान की महत्ता को समझा और इसे तीर्थराज की उपाधि प्रदान की.

लोहार्गल महात्म्यम में बताया गया है कि:-

अस्तिगुह्तमं स्थानं साक्षात्कैवल्यसाधनम् नाम्रा लोहार्गलं ब्रह्मह्दाज्जां शुचापहम..
यत्र ब्रह्मादयो देवा ऋष्यश्र तपोधना:. विष्णुमाराध्य तपसा सर्वार्थान्प्रतिपेदिरे..
यत्र पञ्चविधा जाता नदी कैवल्यदायिनी. यत्र वै देवदेवस्य सान्निध्यं नित्यशो हरे..

अर्थात;- ब्रह्मकुंड से उत्पन्न साक्षात, मुक्तिदायक, शोकनाशक, अत्यंत गोपनीय लोहार्गल नामक एक स्थान है जहां पर ब्रह्मादिक देवगण एवं तपोधन ऋषिलोग तप के द्वारा विष्णु भगवान की आराधना कर अपनी समस्त कामनाओं को प्राप्त हुए हैं. जहां पर मुक्ति देने वाली पांच नदियां बह रही हैं और जहां पर देवों के देव विष्णु भगवान सर्वदा निवास करते हैं. हिमाद्री संकल्प में भी चतुर्थ गुप्त तीर्थों में इस तीर्थ का नाम उल्लेखनीय हैं.

लोहार्गल के कुंड में पानी गोमुख से आता है. यहां भीम कुण्ड की खुदाई करने पर महाभारत कालीन कलश मिले थे. यहां महात्मा चेतनदास द्वारा बनवाई गई विशाल बावड़ी हैं, जो राजस्थान की विशालतम बावडिय़ों में से एक हैं. 108 सीढ़ियों वाली यह एक विशाल व भव्य बावड़ी है जो उचित देखरेख के अभाव में अपना वैभव खोती जा रही है.

पहाड़ की डेढ किलोमीटर ऊंची चोटी पर वनखण्डी का सुन्दर मन्दिर बना हुआ हैं. कुण्ड के पास ही प्राचीन शिव मन्दिर, हनुमान मन्दिर और पहाड़ में पाण्डवों की विशाल गुफा स्थित हैं. पास ही पहाड़ पर चार सौ सीढियां चढने पर बाबा मालकेतु के दर्शन होते हैं.

यहां के बारे में एक अन्य जनश्रुति इस प्रकार है कि जब भगवान विष्णु ने ब्रह्म सरोवर की स्थापना की तो हर व्यक्ति उस सरोवर में स्नान करके स्वर्ग जाने लगा. इस पर ऋषि मुनियों ने भगवान विष्णु से जाकर कहा कि इस प्रकार तो भगवान कर्म का महत्त्व ही समाप्त हो जायेगा तथा हमारी तपस्या का क्या होगा. विष्णु भगवान ने महात्माओं के कहने पर सुमेरु पर्वत के माल व केतु नामक दो पुत्रों को आदेश दिया कि इस सरोवर को ढक़ दो तो वे इस पर आकर बैठ गए तथा सरोवर बंद हो गया.

इस पर पुन: समस्या उठ गई कि यह तो सभी के लिये बंद हो गया. भगवान विष्णु ने माल- केतु को अपने पंख ढीले करने को कहा. पंख ढीले होने पर इनमें से आठ जगह से पवित्र जल की धारा निकली जो सूर्यकुण्ड, किरोड़ी, शाकम्बरी, नागकुण्ड, कोकुण्ड, खोरीकुण्ड, ब्रह्मकुण्ड व भीमकुण्ड में हैं.

यहां प्रतिवर्ष भाद्रपद माह कि अमावस, सोमवती अमावस, पूर्णिमासी, सूर्य ग्रहण व चन्द्र ग्रहण पर विशाल मेला लगता हैं, जिसमें लाखों लोग यहां के पवित्र सूर्य कुण्ड में स्नान करते हैं. आज भी यहां के पवित्र कुंड के जल में डाले गए सिक्के या लोहे से बना सामान कुछ दिनों में गलने लग जाता है.

धार्मिक एवं एतिहासिक स्थल होने के बावजूद भी सूर्यकुण्ड के पास सफाई व्यवस्था की हालत काफी खराब हैं. मुख्य द्वार पर कोई फाटक न होने के कारण आवारा पशु मुख्य कुण्ड तक घूमते रहते हैं. इस कारण चारों ओर गन्दगी व्याप्त रहती हैं. यहां आने वाली सडक़ की हालत अत्यन्त खराब हैं.

परिक्रमा मार्ग का विकाश वैष्णों देवी की तर्ज पर किया जाये तो यहाँ साल भर लाखों श्रद्धालु परिक्रमा करने आ सकते हैं. राज्य का पर्यटन विभाग भी इस ओर कोई ध्यान नही दे रहा हैं. यदि वन एवं पर्यावरण विभाग भी यहां के विकास में रुचि दिखाये तो यहां प्रतिवर्ष हजारो देशी-विदेशी पर्यटक आ सकते हैं. यहां आने वाले श्रद्धालुओं के रहने की व्यवस्था सहीं नहीं तथा आने के लिए कोई नियमित बस सेवा भी उपलब्ध नहीं हैं.

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