यहां माता को खुश करने के लिए जलाए जाते हैं 1100 दीये, रात में आती हैं देवी

आस्था

PATNA… धर्म ग्रंथों के अनुसार माता सती के अंग जहां-जहां गिरे, वहां शक्तिपीठ के रूप में उनकी उपासना की जाती है। हिंदू धर्म में कुल 51 शक्तिपीठों की मान्यता है। इन्हीं में से एक हैं उज्जैन स्थित मां हरिसिद्धि, जहां माता सती की कोहनी गिरी थी।

मान्यता के अनुसार इस मंदिर में सिर्फ रात के समय ही देवी निवास करती हैं। और उनको प्रसन्न करने 1100 दीपक जलाए जाते हैं। गुजरात स्थित पोरबंदर से करीब 48 किमी दूर मूल द्वारका के समीप समुद्र की खाड़ी के किनारे मियां गांव है। खाड़ी के पार पर्वत की सीढिय़ों के नीचे हर्षद माता (हरसिद्धि) का मंदिर है।

 

मान्यता है कि उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य यहीं से आराधना करके देवी को उज्जैन लाए थे। तब देवी ने विक्रमादित्य से कहा था कि मैं रात के समय तुम्हारे नगर में तथा दिन में इसी स्थान पर वास करूंगी। इस कारण आज भी माता दिन में गुजरात और रात में मप्र के उज्जैन में वास करती हैं।

स्कंदपुराण में कथा है कि एक बार जब चंड-प्रचंड नाम के दो दानव जबरन कैलास पर्वत पर प्रवेश करने लगे तो नंदी ने उन्हें रोक दिया। असुरों ने नंदी को घायल कर दिया। इस पर भगवान शिव ने भगवती चंडी का स्मरण किया। शिव के आदेश पर देवी ने दोनों असुरों का वध कर दिया।

प्रसन्न महादेव ने कहा, तुमने इन दानवों का वध किया है। इसलिए आज से तुम्हारा नाम हरसिद्धि प्रसिद्ध होगा। सम्राट विक्रमादित्य माता हरसिद्धि के परम भक्त थे। किवदंती है कि हर बारह साल में एक बार वे अपना सिर माता के चरणों में अर्पित कर देते थे, लेकिन माता की कृपा से पुन: नया सिर मिल जाता था।

बारहवीं बार जब उन्होंने अपना सिर चढ़ाया तो वह फिर वापस नहीं आया। इस कारण उनका जीवन समाप्त हो गया। आज भी मंदिर के एक कोने में 11 सिंदूर लगे मुण्ड पड़े हैं। कहते हैं ये उन्हीं के कटे हुए मुण्ड हैं। उज्जैन में हरसिद्धि मंदिर ज्योतिर्लिंग श्री महाकालेश्वर मंदिर के पीछे पश्चिम दिशा में स्थित है।

दोनों मंदिरों के बीच पौराणिक रुद्रसागर है। यह मंदिर मराठाकालीन है। मुख्य मंदिर के चारों ओर परकोटा है, जिसमें चारों दिशाओं में द्वार बने हुए हैं। मंदिर की विशेषता दो विशाल दीप स्तंभ हैं। मंदिर परिसर में ही परमार कालीन (दसवीं शताब्दी) बावड़ी है। गर्भगृह में देवी श्रीयंत्र पर विराजमान हैं।

सभामंडप में ऊपर की ओर भी श्रीयंत्र बनाया गया है। इस यंत्र के साथ ही देश के 51 देवियों के चित्र बीज मंत्र के साथ चित्रित हैं। मुख्य गर्भगृह में माता हरसिद्धि के आस-पास महालक्ष्मी और महासरस्वती भी विराजित हैं। परकोटे के अंदर ही चिंताहरण विनायक मंदिर, हनुमान मंदिर और 84 महादेव मंदिरों में से एक श्री कर्कोटेश्वर महादेव मंदिर हैं।

यहां की शक्ति का स्वरूप मंगलचंडिका है और भैरव मांगल्यकपिलांबर है। मंदिर परिक्षेत्र में दो विशालकाय दीप-स्तंभ हैं, जो नर-नारी के प्रतीक माने जाते हैं। दाहिनी ओर का बड़ा स्तंभ है, जबकि बायीं ओर का छोटा है। ऐसा माना जाता है कि ये दोनों स्त्री-पुरुष के प्रतीक हैं।

कुछ लोग इनको शिव-शक्ति का प्रतीक भी मानते हैं। दोनों स्तंभ पर 1100 दीप हैं। इन दीपों को रोशनी से जगमगाने में करीब 60 किलो तेल लगता है।

 

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