‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गदपि गरीयसी.’

संस्कृत भाषा में लिखे इस श्लोक का तात्पर्य है कि जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर हैं. जननी यानी कि मां (Mother) और जन्मभूमि यानी कि जिस जमीन पर आपने जन्म लिया जहां आपकी परवरिश हुई. संस्कृत में लिखा गया यह श्लोक वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण की पांडूलिपियों में दो जगह मिलता है. एक जगह खुद प्रभु श्री राम लक्ष्मण से कहते हैं कि –

अपि स्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते ।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ॥

यानी कि लक्ष्मण! यद्यपि यह लंका सोने की बनी है, फिर भी इसमें मेरी कोई रुचि नहीं है। (क्योंकि) जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी महान हैं. एक अन्य जगह ऋषि भारद्वाज, राम को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि-
मित्राणि धन धान्यानि प्रजानां सम्मतानिव ।
जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ॥
यानी कि मित्र, धन्य, धान्य आदि का संसार में बहुत अधिक सम्मान है. (किन्तु) माता और मातृभूमि का स्थान स्वर्ग से भी ऊपर है. भारतीय वेदों और पुराणों में मां को देवी स्वरूपा माना गया है. वेद, पुराणों में मां के लिए अंबा, अम्बिका, दुर्गा, देवी, सरस्वती, शक्ति, ज्योति, पृथ्वी आदि नामों से पुकारा गया है. मां को मात, मातृ, अम्मा, जननी, जन्मदात्री, जीवनदायिनी, धात्री, प्रसू भी कहा जाता है.
महाभारत में भी मां की महिमा का जिक्र है. जब यक्ष धर्मराज युधिष्ठर से सवाल करते हैं कि ‘भूमि से भारी कौन?’ तब युधिष्ठर जवाब देते हुए कहते हैं-

‘माता गुरुतरा भूमेरू.’

इसका तात्पर्य है कि , माता इस भूमि से कहीं अधिक भारी होती हैं.

महाभारत महाकाव्य के रचियता महर्षि वेदव्यास ने ‘मां’ की महिमा का बखान करते हुए लिखा है कि…


नास्ति मातृसमा छाया, नास्ति मातृसमा गतिः।
नास्ति मातृसमं त्राण, नास्ति मातृसमा प्रिया।।’
इसका अर्थ है कि- मां के समान कोई छाया नहीं है, मां के समान कोई सहारा नहीं है. मां के समान कोई रक्षक नहीं है और मां के समान कोई प्रिय चीज नहीं है.

तैतरीय उपनिषद में भी मां की महिमा का वर्णन इस तरह से मिलता है…

‘मातृ देवो भवः.’

इसका अर्थ है कि – माता देवताओं से भी बढ़कर होती है.

Sources:-News18

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