जुलाई में इस दिन पड़ रही है गुरु पूर्णिमा, जानिए क्या है पूजन विधि

संस्कृति और परंपरा

आषाढ़ मास को चौथा मास माना गया है, जिसका पूजा-पाठ की दृष्टि से विशेष महत्व होता है. हर वर्ष आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाए जाने का विधान है. हिन्दू पंचांग के अनुसार, यही वो विशेष दिन होता है जब भारत में ही नहीं बल्कि दुनियाभर में लोग श्रद्धाभाव से अपने गुरुओं का सम्मान करते हुए, उनका आशीर्वाद लेते हैं.

गुरु गोविन्द दोऊ खड़े , काके लागू पाय|
बलिहारी गुरु आपने , गोविन्द दियो बताय||

हमारी संस्कृति में गुरु को गोविंद से भी बड़ा कहा जाता है, क्योंकि वो गुरु ही होता है जो व्यक्ति के ज्ञान में वृद्धि करता है. गुरु द्वारा दिखाए गए मार्ग और ज्ञान से ही व्यक्ति समय-समय पर अपने जीवन में आ रहे हर अंधकार को दूर कर सफलता की सीढ़ी चढ़ता है. इसलिए भी गुरु पूर्णिमा का महत्व बढ़ जाता है.

हर साल गुरु पूर्णिमा बड़े धूमधाम के साथ स्नान और मंदिर में ख़ास पूजा के साथ मनाई जाती है लेकिन इस बार कोरोना के चलते इसे शांति के साथ नियमों का पालन करते हुए मनाया जाएगा.

ऐसे करें गुरु पूर्णिमा की पूजा-

गुरु पूर्णिमा के दिन सुबह जल्दी उठने के बाद स्नान करें और घर को स्वच्छ करें. इसके बाद उत्तर दिशा में श्वेत वस्त्र पर गुरु का चित्र, मूर्ति आदि को श्रद्धा भाव से स्थापित करें. फूल चढ़ाएं, माला पहनाएं. इसके उपरांत फल और मिष्ठान अर्पित करें. इसके बाद फूल-माला, रोली, श्रीफल, जनेऊ, दक्षिणा और पंचवस्त्र लेकर अपने गुरु के स्थान पर जाएं। अपने गुरु के चरणों को अच्छे से धोकर उनकी पूजा करें। सामर्थ्य के आधार पर उन्हें फल, फूल, धन और मिष्ठान दें।

इस दिन पीले वस्त्र धारण करना अच्छा माना गया है. इस दिन वस्त्र, फल, मिष्ठान और अनाज आदि का दान करना चाहिए.

इस वर्ष 2021 में आषाढ़ मास की पूर्णिमा जुलाई 23, शुक्रवार को 10 बजकर 45 मिनट से आरम्भ होगी और अगले दिन यानी जुलाई 24, शनिवार को 08 बजकर 08 मिनट पर समाप्त होगी, ऐसे में इस वर्ष 24 जुलाई को ही गुरु पूर्णिमा पूर्व मनाया जाएगा.

जैसा हमने पहले भी बताया कि सभी धर्मों में गुरु का स्थान सर्वोच्च माना गया है. कई पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महाभारत के रचयिता महान ऋषि वेद व्यास जी का जन्म गुरु पूर्णिमा के दिन ही हुआ था, यही कारण है कि गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है. इस दिन लोग ऋषि वेद व्यास जी की पूजा के साथ ही अपने गुरु, इष्ट और आराध्य देवताओं की पूजा करते हुए, उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं. ये पर्व एक परंपरा के रूप में गुरुकुल काल से ही मनाया जाता रहा है.

कई पौराणिक शास्त्रों व वेदों में गुरु को हर देवता से ऊपर बताया गया है, क्योंकि गुरु का हाथ पकड़कर ही शिष्य जीवन में ज्ञान के सागर को प्राप्त करता है. प्राचीन काल में जब गुरुकुल परंपरा का चलन था, तब सभी छात्र इसी दिन श्रद्धा व भक्ति के साथ अपने गुरु की सच्चे दिल से पूजा-अर्चना कर, उनका धन्यवाद करते थे और शिष्यों की यही श्रद्धा असल में उनकी गुरु दक्षिणा होती थी.

गुरु पूर्णिमा के शुभ पर्व पर देशभर की पवित्र नदियों व कुण्डों में स्नान और दान-दक्षिणा देने का भी विधान होता है. साथ ही इस दिन मंदिरों में भी विशेष पूजा-अर्चना होती है और जगह-जगह पर भव्य मेलों का आयोजन भी होता हैं. हालांकि इस वर्ष कोरोना काल के कारण ये पर्व सूक्ष्म रूप से मनाया जाएगा.

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