आखिरकार क्यों हुआ गोलघर का निर्माण….?

इतिहास

बिहार के मुख्य धरोहरों में से एक है गोलघर, जो पटना को प्राचीन समय से गर्वान्वित करता आ रहा है। ब्रिटिश इंजिनियर कैप्टन जान गार्स्टिन ने 30 महीनों में इसका निर्माण वर्ष 1786 में करवाया था, मकसद था अनाज का भंडारण।

पूरे शहर का नजारा देखा जा सकता है

इसका आकार 125 मीटर और ऊंचाई 29 मीटर है। इसमें कोई स्तंभ नहीं है और इसकी दीवारें आधार में 3.6 मीटर मोटी हैं। गोलघर के शिखर पर लगभग तीन मीटर तक ईंट की जगह पत्थरों का प्रयोग किया गया है। गोलघर के शीर्ष पर दो फीट 7 इंच व्यास का छिद्र अनाज डालने के लिये छोड़ा गया था, जिसे बाद में भर दिया गया। 145 सीढियों के सहारे आप इसके उपरी सिरे पर जा सकते हैं जहाँ से शहर का एक बड़ा हिस्सा देखा जा सकता है और गंगा के मनोहारी दृश्य को यहाँ से निहारा जा सकता है।

अद्भूत है गोलघर

स्थापत्य का अदभुत नमुना है गोलघर। इसके निर्माण में कहीं भी स्तंभ नहीं है। गुम्बदाकार आकृति के कारण इसकी तुलना 1627-55 में बने मोहम्मद आदिल शाह के मकबरे से की जाती है। गोलघर के अंदर एक आवाज 27-32 बार प्रतिध्वनित होती है। यह अपने आप में अद्वितीय है।

गोलघर को बनाया जा रहा है और बेहतरीन

गोलघर को पटना का एक बेहतरीन पर्यटन स्थल बनाने के लिए यहां काफी जगहों पर निर्माण कार्य किये जा रहे हैं। कुछ सालों पहले गोलघर में न ही कोई गार्डन हुआ करता था और न ही इसके आसपास का नज़ारा अच्छा था। लोग यहां आकर सिर्फ गोलघर पर चढ़कर शहर का नज़ारा देखकर वापस चले जाते थे। लेकिन अब यहां आमजन के लिए एक गार्डन बना दिया गया है। इसके साथ ही 3 साल पहले गार्डन में एक लेज़र शो की शुरुवात भी की गई थी, जिसका प्रदर्शन हर शाम 6 बजे किया जाता है।अभी भी गोलघर की इमारत में निर्माण कार्य चल रहे हैं। इसके लिए बिहार पर्यटन विभाग और कला संस्कृति विभाग की तरफ से फंड दिया गया है।

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