मन को मोह लेती हैं बिहार की ये प्राचीन पर्वतों की वादियां

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प्रेत शिला पर्वत गया शहर से छह मील उत्तर-पश्चिम में अवस्थित है। यह पर्वत हिंदू धर्म के अनुसार प्रेत राजा यम का निवास स्थान के रूप में चिह्नित है जिसकी पूजा-अर्चना भी की जाती है।

यहाँ सूर्य, विष्णु, महिषासुर, मर्दिनी दुर्गा, शिव-पार्वती तथा अन्य ब्राह्मण संप्रदाय से संबंधित उपासङ्गङ्खों का केन्द्र स्थल माना जाता है।

इसी के नीचे राम ङ्गुंड है जिसके बारे में कहा जाता है कि श्रीराम ने इसी ङ्गुंड में स्नान किया था।

झारखंड और बिहार की सीमा और फल्गु नदी के तट पर बसा गया बिहार प्रान्त का दूसरा सबसे बड़ा शहर है। वाराणसी की तरह गया की प्रसिद्धि मुख्य रुप से धार्मिक नगरी के रुप में है। पितृपक्ष के अवसर पर यहाँ हजारों श्रद्धालु पिंडदान के लिये जुटते हैं। गया भारत का महान तीर्थ स्थल है जो गयाधाम व गया जी के नाम से भी प्रसिद्ध है।

पाँच पहाड़ियों से घिरे होने के कारण इसकी स्थिति मनोरम बन जाती है। उत्तर-पश्चिम से मुरली पहाड़, पश्चिम से कटारी पर्वत, उत्तर-पूर्व में रामशिला, पूर्व में अबगिला की पहाड़ी तथा दक्षिण से ब्रह्मयोनि पहाड़ से घिरा है। अथर्ववेद में मगध का उल्लेख है।

जैन साहित्य में सोलह महाजनपदों के साथ मगध को भी एक महाजनपद के रूप में स्वीकार किया गया है। इस शहर को विष्णु नगरी भी कहा जाता है। गयाधाम से पूर्व दिशा में बैद्यनाथधाम एवं पश्चिम में काशी विश्वनाथधाम लगभग समान दूरी पर स्थित है।

प्राचीन पालि ग्रन्थों एवं ललितविस्तर में गया के मन्दिरों का उल्लेख है। गया कई अवस्थाओं से गुजरा है। ईसा की कई शताब्दियों पूर्व यह एक समृद्धिशाली नगर था। ईसा के उपरान्त चौथी शताब्दी में यह नष्ट प्राय था।

किन्तु सातवीं शताब्दी में ह्वेनसाँग ने इसे भरा-पूरा लिखा है जहाँ ब्राह्मणों के 1000 कुल थे। आगे चलकर जब बौद्ध धर्म की अवनति हो गयी तो इसके अन्तर्गत बौद्ध अवशेषों की भी परिगणना होने लगी।


मंगलागौरी

मंगलागौरी शक्तिपीठ वाले इस पर्वत को भस्मकूट पर्वत कहते हैं। इस शक्तिपीठ को असम के कामरूप स्थित माँ कमात्रया देवी शक्तिपीठ के समान माना जाता है।

कालिका पुराण के अनुसार गया में सती का स्तन मंडल भस्मकूट पर्वत के ऊपर गिरकर दो पत्थर बन गये थे। इसी प्रस्तरमयी स्तन मंडल में मंगलागौरी मां नित्य निवास करती हैं जो मनुष्य शिला का स्पर्श करते हैं वे अमरत्व को प्राप्त कर ब्रह्मलोक में निवास करते हैं।

इस शक्तिपीठ की विशेषता यह है कि मनुष्य अपने जीवन काल में ही अपना श्राद्ध कर्म यहाँ संपादित कर सकता है।

ब्रह्मयोनि

ब्रह्मयोनि पहाड़ यहाँ की मुख्य पहाड़ियों में से एक है जिसकी ऊँचाई लगभग 600 फुट है और धार्मिक दृष्टि से यह पहाड़ काफी महत्व का है। पहाड़ के ऊपरी भाग में लंबी प्राकृतिक दरार है जिसे योनि की संज्ञा दी जाती है जो मातृयोनि और पितृयोनि के नाम से प्रसिद्ध है।

इस योनि से होकर गुजरने से मनुष्य पुनर्जन्म के भय से मुक्त हो जाता है। इस धार्मिक भावना से अभिभूत होकर पर्यटक इस पहाड़ पर चढ़ते हैं। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, ब्रह्मयोनि जगत पुरुष ब्रह्मा की प्रिय स्थली है।

पहाड़ के शिखर पर प्राचीन मंदिर के साथ ब्रह्म सरोवर का दर्शन किया जा सकता है। अक्रिन पुराण में इसे एक तीर्थ स्थल के रूप में उल्लेख किया गया है। इसके शिखर पर एक प्राकृतिक स्वरूप चित्र अंकित है जिसे ब्रह्म की स्द्ब्री शक्ति समझा जाता है।

रामशिला

रामशिला एक प्रसिद्ध धर्म तीर्थ है जहाँ से संपूर्ण गया क्षेत्र का दृश्य बड़ा ही मनोरम दिखता है। टिकारी नरेश द्वारा बनवाई गई सीढियों से युक्त इस पर्वत पर पातालेश्वर शिव और राम लक्ष्मण मंदिर दर्शनीय है।

गया शहर को तालाबों का शहर भी कहा जाता है। यहाँ अनेक तालाब शहर के विभिन्न भागों में पाए जाते हैं। रवीन्द्र सरोवर को सुन्दर बनाया गया है तथा पर्यटकों को लुभाने के लिए नाव परिचालन की भी व्यवस्था है।

श्राद्ध की नगरी गया

कहा जाता है कि भगवान विष्णु ने इस नगरी को गयासुर जैसे पापियों को उबार कर सीधे स्वर्ग भेजने की की दैवी शक्ति प्रदान की थी। इसी विश्वास के कारण हजारों श्रद्धालु यहाँ अपने मृत संबंधियों का श्राद्ध करने के लिए आते हैं।

अंत: सलिला फल्गु नदी के तट पर विष्णुपद मंदिर से सुशोभित पितर द्वारिणी मोक्षप्रदायिनी तीर्थ गया को भारतीय तीर्थों में सर्वोत्तम स्थान प्राप्त है।

शास्त्रों में कहा गया है कि गया में एक बार श्राद्ध करने वालों की बाद में श्राद्ध की जरूरत नहीं पड़ती है। सनातन धर्म में गंगा तट पर अंतिम संस्कार और गया में पिंड प्रदान करना परम पवित्र माना गया है। वेदों और पुराणों में गया शब्द विभिन्न स्थलों पर विभिन्न रूपों में प्रयुक्त हुआ है।

गया नाम ऋगवेद की कुछ ऋचाओं के रचयिता के लिए प्रयुक्त हुआ है। वेद संहिताओं में यह नाम असुरों और राक्षसों के लिए आया है। महाभारत के ६४वें अध्याय में कहा गया है कि गया जाने से अश्वमेध का फल और कुल का उद्धार होता है।

गया का उल्लेख महाभारत में पांडवों की तीर्थ यात्रा के प्रसंग में किया गया है। राजर्षि गय के नाम पर ही गया का नामकरण हुआ। महाभारत काल में सोहल चक्रवर्ती राजाओं में वृद्दहद्रथ और गय (गया शीर्ष) के नाम की चर्चा की गई है। पुराणों के अनुसार गयासुर नामक राक्षस का यह निवास स्थान था जिसे विष्णु ने यहाँ राक्षसी प्रवृत्ति से मुक्त किया था।


विष्णुपद मंदिर

विष्णुपद मंदिर वैष्णवों के लिए एक प्रमुख तीर्थ स्थल है। इस विशाल मंदिर की ऊँचाई सौ फुट तथा मंडप ५० वर्ग फुट का है। मंदिर निर्माण का भी अपना ही इतिहास रहा है। माना जाता है कि यहाँ गुप्तकाल में शिखरहीन सपाट छत का मंदिर बनाया गया था, जिसके विध्वंस के बाद महीपाल के पुत्र नयपाल ने पुरोहितों के आग्रह पर ग्यारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में इसे फिर बनवाया।

दूसरी बार इसके विध्वंस होने पर, १६वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में राजपूत राजाओं ने इसे मजबूत सुन्दर पत्थरों को चूने से जोड़कर बनवाया।

परन्तु अंत में इसका जीर्णोद्धार १७६०-१७६८ के बीच होल्कर की महारानी अहिल्याबाई ने करवाया। यहाँ भगवान विष्णु के चरण चिह्न 13 इंच लंबे हैं।

चरण चिह्न के ऊपर चाँदी का अष्टपहल है। इसे बाल गोविन्द ने बनवाया था। मंदिर में प्रवेश के लिए दो प्रवेश द्वार हैं। मुख्य मंदिर के प्रवेश भी अलंकृत हैं जिनके दरवाजे पर द्वारपाल की सुंदर धातु की मूर्ति देखी जा सकती है।

इसके पूर्वी दरवाजे के बाहर छत से बूँद-बूँद कर पानी टपकता रहता है। मंदिर के सामने थोड़ी दूर पर एक गज मूर्ति है जो सूँड़ में फल और फूल लिये हुए खड़ी है। मानो वह फल-फूल विष्णुपद पर समर्पित कर रही है। श्री विष्णु पद मंदिर का सबसे सबल पक्ष यहाँ का शृंगार है।

चौदह सैया गयावाल पंडा ही बारी-बारी से इसकी पूजा करते हैं। शास्त्रों में विख्यात है- अलंकारे प्रिय विष्णु: जलधारा प्रिय: शिव। मंदिर के बगल में पूर्व की ओर सभा मंडप है। इसमें एक बड़ा घंटा है जिसे अंग्रेज अधिकारी जरन क्रलैएड ने लगवाया था।

एक अन्य घंटा नेपाल राजा द्वारा लगवाया गया है। इस मंदिर के संबंध में कहा जाता है कि कोई चोर मंदिर के ऊपर सोने की छतरी चुराने के लिए चढ़ा था। वह ऊपर से गिरा और पत्थर का हो गया। जहाँ वह गिरा उस स्थल पर एक काला पत्थर लगा दिया गया है।

विष्णुपद जिस पहाड़ी पर है वह गया के पूर्वी किनारे पर है। अत: इसके लिए उद्यन्त या उदयगिरी की संज्ञा कहना उचित होगा। वैदिक देव विष्णु में सूर्य देव सावित्री की अनेक विभूतियाँ समाहित हैं। इस कारण महाभारत का सावित्री पद स्वाभाविक तौर पर गया स्थित विष्णुपद ही सिद्ध होता है।

विष्णुपद से संबद्ध एक अन्य प्रमाण वैशाली में प्राप्त हुए है। वहाँ उत्खनन के क्रम में गुप्त कालीन मिट्टी की मुहर मिली है जिस पर शूल दंड, शंख और चक्र अंकित है। इसकी बायीं ओर चन्द्र तथा पहिए का चिह्न है।

इस पर एक लेख भी उत्कीर्ण है जो विष्णुपद स्वामी नारायण का है। अनुमान है कि इसका संबंध प्रसिद्ध विष्णुपद से होना चाहिए । ऐसी स्थिति में गया स्थित विष्णुपद मंदिर गुप्तकाल में भी विद्यमान होना चाहिए।

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