बैरिस्टर मोहनदास करमचंद गांधी ने ‘महात्मा’ के रूप में बिहार में ही ‘अवतार’ लिया था। गांधीजी के चंपारण आंदोलन में दर्जनों युवाओं ने अपना सर्वस्व त्याग दिया था। उनमें राजेंद्र प्रसाद भी शामिल थे। उन युवाओं के त्याग, तप, मेहनत और अविरल संगठित संघर्ष का ही फल था कि ‘कठियावाड़ी ड्रेस’ में बिहार पहुंचे बैरिस्टर मोहनदास करमचंद गांधी चंपारण से ‘महात्मा’ बनकर लौटे और फिर भारतीय राजनीति में चमकते सूर्य की तरह छा गए। गांधीजी ने अपने युवा सहयोगियों के साथ 2841 गांवों का सर्वेक्षण कराया था और निलहों के खिलाफ ठोस आंदोलन की शुरुआत की।चंपारण में उनके सत्याग्रह से ही भारतीय स्वाधीनता संग्राम के गांधी युग की नींव पड़ी, जो 15 अगस्त 1947 को देश की आजादी की मंजिल पर पहुंच कर पूरी हुई।

संघर्ष कर रहे नील उत्पादक किसान राजकुमार शुक्ल को जब जानकारी हुई कि दक्षिण अफ्रीका में भारतीय मूल के गिरमिटिया मजदूरों के मानवाधिकार के लिए संघर्ष करने वाले बैरिस्टर गांधी दो साल पहले भारत लौट आए हैं और कांग्रेस पार्टी से जुड़कर भारतीय राजनीति में सक्रिय हैं, तो वे गांधी को चंपारण बुलाने के प्रयास में लग गए। दिसंबर 1916 में वे लखनऊ में कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन में बिहार के किसानों के प्रतिनिधि बनकर पहुंचे और पहली बार गांधीजी से मिले। गांधीजी को बिहार लाने का श्रेय राजकुमार शुक्ल को ही जाता है। उनके आग्रह पर ही महात्मा गांधी चंपारण पहुंचे सत्याग्रह आंदलन किया और पूरे देश में छा गए।

वर्ष 2017 के चंपारण सत्याग्रह के तीन साल बाद वर्ष 1920 में गांधीजी के आह्वान पर शुरू हुए असहयोग आंदोलन में भी बिहार ने अपनी व्यापक भूमिका निभाई और 1931-32 आते-आते तो बिहार क्रांतिकारी गतिविधियों का बड़ा केंद्र बन गया। बिहार के 20 से अधिक क्रांतिकारियों को काला पानी (अंडमान जेल) की सजा हुई थी। 1932-34 में गांधीजी ने एक बार फिर रोहतास जिला सहित बिहार के कई जिलों का लगातार दौरा किया था। उनके आह्वान पर जातीय भेदभाव, छुआछूत, पर्दा प्रथा, बाल विवाह के खिलाफ आंदोलन में बिहार की महिलाओं ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। महात्मा गांधी का सपना ऐसे भारत का था, जहां सबको, देश के आखिरी आदमी तक को बराबरी के आधार पर जीने और अपना भविष्य तय करने का संवैधानिक अधिकार हो। मगर सच यही है कि आजादी के बाद राजनीति का स्वरूप ही बदल गया और राजनीति कारोबार में तब्दील हो गई। चंपारण सत्याग्रह के सौ साल बाद भी यह सवाल खड़ा है कि देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व कुर्बान कर देने वाले स्वतंत्रता सेनानियों का सपना क्या ऐसे ही भारत का था, जो आज है?

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