राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की बिहार यात्रा के सौ से भी ज्यादा साल बीत गए लेकिन, उनकी स्मृतियां आज भी बिहार के कोने-कोने में बिखरी है. बापू पहली बार 10 अप्रैल 1917 को कोलकाता से पटना पहुंचे थे. उनके साथ में थे पंडित राजकुमार शुक्ल. शुक्ल जी के साथ बापू को चंपारण जाना था और वहां के किसानों की समस्या और निहले साहबों के कारनामे सुनने थे. इसी काम के लिए शुक्ल बापू को पटना तक लेकर आए थे.
सबसे पहले बिहार में मिली थी महात्मा की उपाधि

यह सच है कि गुरु रवींद्रनाथ ने उन्हें महात्मा की उपाधि दी थी. लेकिन बिहार की माटी भी इस बात की साक्षी है कि यहां के भोले-भाले किसान राजकुमार शुक्ल ने उन्हें महात्मा पुकारा था. दस्तावेज गवाही देते हैं कि बिहार की माटी से उन्हें इसी संबोधन से पत्र लिखा गया था. तारीख थी 27 फरवरी 1917. लिखा था- मान्यवर महात्मा! किस्सा सुनते हो रोज औरों के, आज मेरी भी दास्तान सुनो…’ पत्र लंबा है. याचना है कि गांधी चंपारण आएं और यहां की 19 लाख प्रजा की पीड़ा से अवगत हों.

राजकुमार शुक्ल कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में चंपारण के किसानों की आवाज बनकर पहुंचे. गांधी को बुलाने से पहले पंडित मदनमोहन मालवीय और लोकमान्य बालगंगाधर तिलक से भी मिले और चंपारण की समस्या के बारे में बताया. लेकिन इन लोगों ने यह कहकर मना कर दिया कि भारत की आजादी का बड़ा प्रश्न पहले उनके सामने है. बाद में राजकुमार ने गांधी जी से विनती की. कानपुर भी गए. पर गांधीजी से मुलाकात न हो सकी,. अंतत: 10 अप्रैल 1917 को गांधी पटना पहुंचे.
गांधी जी के आह्वाहन पर खोले गये स्कूल

वर्ष 1917- 18 में अंग्रेज हुकूमत के खिलाफ आंदोलन तेज करते हुए गांधीजी ने अंग्रेजों के स्कूल का बहिष्कार करते हुए राष्ट्रीय स्कूल खोलने का आह्वान किया. फिर क्या था विद्यालय एवं महाविद्यालय के शिक्षक अपनी नौकरी छोड़ कर राष्ट्रीय स्कूल खोल कर बच्चों को पढ़ाने लगे.

देश भ्रमण के दौरान जब गांधी वर्ष 1918 में छपरा आए तो गांधी जी के सत्याग्रह और अहिंसा के वाणी लोग में इस तरह से सम्मोहित हो गए कि लोग सरकारी नौकरी छोड़कर असहयोग आंदोलन में कूद पड़े. जिला प्रशासन की स्मारिका सारण में इसका उल्लेख है कि गांधी जी के आह्वान पर जिला स्कूल छपरा के शिक्षक नजीर अहमद ने अपनी नौकरी छोड़ दी और राष्ट्रीय स्कूल में पढ़ाने लगे. गांधी की आज्ञा से छपरा, सीवान एवं गोपालगंज में राष्ट्रीय स्कूल खोले गए. महात्मा गांधी जब 1917 में चम्पारण आये थे तब उन्होंने 20 नवम्बर 1917 को भितिहरवा में एक स्कूल की स्थापना की थी.

जीवन भर थामे रहे मुंगेर की लाठी

प्रतीक के रूप में मशहूर हो चुकी महात्मा गांधी की लाठी मुंगेर में बनी थी. अंग्रेज मुंगेर की ही बनी लाठियों का इस्तेमाल भारतीय क्रांतिकारियों के खिलाफ करते थे. लेकिन अंग्रेजों को क्या पता था कि यही लाठी उनका अंत करेगी. गांधी जी की वो लाठी जो अंतिम समय तक उनके साथ रही, वो उन्हें अप्रैल 1934 में बिहार के घोरघाट(तब का मुंगेर) में मिली थी. उस वक्त गांधी जी बिहार में आए भूकंप के बाद पीड़ितों से मिलने गए थे.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here