बिहार के लोग न सिर्फ विज्ञान में तेज़ होते हैं बल्कि कला के क्षेत्र में भी उनकी काफी अच्छी पकड़ होती है। बिहार ने सिर्फ आईएएस ऑफिसर्स, इंजिनीर्स ही नहीं बल्कि बड़े बड़े लेखक, एक्टर्स, गायक और फिल्म निर्देशक समेत कई महान कला के निर्माता दुनिया को दिया है।

किसी देश के लिए मनोरंजन उतना ही जरूरी है जितना शिक्षा। मनोरंजन की दुनिया में कड़ी प्रतिस्पर्धा के बीच अपने नाम की अलग पहचान बनाना न सिर्फ व्यक्तिगत, बल्कि एक सामाजिक उपलब्धि है। तमाम तकनिकी पिछड़ेपन को पीछे छोड़ अपनी सोच के सहारे आगे निकले ये सभी शक्सियत आज बिहार के लिए गर्व का एक और मौका दे रहे हैं।

प्रकाश झा की फ़िल्में जहाँ कला फिल्मों के ज्यादा करीब हैं वहीं इम्तिआज़ अली कमर्शियल सिनेमा के जाने जाते हैं, वहीं दूसरी तरफ नितिन चंद्रा शॉर्ट फ़िल्में बनाते हैं।

चलिए पढ़ते हैं इनके बारे में..

 

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इम्तिआज़ अली

16 जून 1971ई० को जन्में इम्तिआज़ अली दरभंगा जिले से हैं, जिनका पालन-पोषण पटना और जमशेदपुर(अब झारखण्ड) में हुआ।

‘सोचा न था’ से बॉलीवुड फ़िल्में बनाने का इम्तिआज़ का सफ़र ‘जब वी मेट’ के जरिये चर्चा में आया। ‘लव आज-कल’ और ‘रॉकस्टार’ से बुलंदियों तक पहुँचाया तो वहीं ‘हाईवे’ से इनके विचारों की प्रस्तुति का नया रास्ता खुलता दिखा।

इनकी अपनी फिल्म प्रोडक्शन कंपनी, ‘विंडो सीट फिल्म्स’, भी है जिसके साथ आई फिल्म ‘हाईवे’ और ‘तमाशा’ अलग किस्म की फ़िल्में हैं। इम्तिआज़ की फिल्मों की ख़ासियत अच्छी कहानी के साथ सुंदर लोकेशन्स भी होते हैं।

 

नितिन नीरा चंद्रा

यूट्यूब पर ‘NEO-BIHAR’ नामक चैनल की तरफ से हाल में रिलीज़ वीडियोज से खासी चर्चा में रहे नितिन चंद्रा की ख़ासियत इनका क्षेत्रीय भाषाओं से लगाव और इन्हीं भाषाओं में किया गया इनका काम है। अभिनेत्री बहन नीतू चंद्रा के साथ ‘चंपारण टॉकीज’ नाम की प्रोडक्शन कंपनी के बैनर तले ‘मिथिला मखान’ लाकर इन्होंने न सिर्फ भारत, बल्कि विश्व स्तर पर बिहार और मिथिला की छवि को मजबूती से पेश किया।

‘मिथिला मखान’ बिहार-झारखण्ड की वो पहली फिल्म बनी जिसने नेशनल अवार्ड्स तक का सफर तय किया। हाल ही में ‘चौथा क्लास के ड्राइंग बुक’ नाम से वीडियो लाकर इन्होंने भोजपुरी में बच्चों के लिए किये गये काम की खल रही कमी को भी दूर किया।

 

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संवेदनशीलता के साथ बनाई गयी अपनी पहली ही फिल्म ‘देसवा’ से इन्होंने जता दिया था कि ये क्षेत्रीय भाषाओं, खासकर भोजपुरी, की बिगड़ती छवि को सुधारते हुए नये विषयों पर अच्छी फ़िल्में बना सकते हैं।

‘देसवा’ वो पहली भोजपुरी फिल्म थी जो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ़ इंडिया, इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ़ साउथ एशिया के साथ ही कई अन्य इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल्स में दिखाई गई।

पुणे युनिवर्सिटी से फिल्म मेकिंग की पढ़ाई पूरी करने वाले नितिन चंद्रा पटना में पले-बढ़े हैं। नितिन NEO BIHAR के जरिये बिहार की क्षेत्रीय भाषाओं में काम कर रहे हैं।
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प्रकाश झा

27 फरवरी 1952 को पश्चिम चम्पारण में जन्में बॉलीवुड के बड़े निर्देशकों में शुमार किये जाने वाले प्रकाश झा सामजिक मुद्दों को उजागर करती फ़िल्में बनाने के जाने जाते हैं। राजनैतिक विचारधारा पर मजबूत पकड़ वाली फ़िल्में इनकी राजनैतिक समझ को जाहिर करती हैं।

1984 में आई पहली ही फिल्म ‘दामुल’ के लिए नेशनल फिल्म अवार्ड फॉर बेस्ट फीचर फिल्म का अवार्ड अपने नाम करने वाले प्रकाश झा अपनी हालिया रिलीज़ ‘गंगाजल २’ में अभिनय भी कर चुके हैं। इनकी अपनी प्रोडक्शन कंपनी भी है, जिसका नाम है ‘प्रकाश झा प्रोडक्शन्स’।

इसके अलावा पटना का ‘P&M मॉल’ भी प्रकाश झा का ही है। देश के विभिन्न संवेदनशील मुद्दों पर बनी इनकी फिल्म काफी चर्चा में रहती है।

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‘मृत्युदंड’, ‘अपहरण’, ‘गंगाजल’, ‘राजनीति’, ‘चक्रव्यूह’, ‘आरक्षण’ और ‘सत्याग्रह’ जैसी फ़िल्में न सिर्फ दर्शकों का दिल जीतती हैं बल्कि आलोचकों से सराहना भी पातीं हैं और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर में ध्यानाकर्षण भी।

1991ई० से संचालित प्रकाश झा की स्वयंसेवी संस्था ‘अनुभूति’ बिहार के सांस्कृतिक, स्वास्थ्य सहित इन्फ्रास्ट्रक्चर के विकास में भी सहयोग करती है।

 

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