नवरात्र 29 सितंबर से शुरू हो रहा है। बिहार के भागलपुर में कई जगहों पर वर्षों से भव्य तरीके से दुर्गा पूजा होती रही है। खासकर महाशय डयूढ़ी में तीन सौ वर्षों से अधिक समय से प्रतिमा स्थापित कर पूजा-अर्चना की जा रही है। यहां मेढ़ चढ़ने की परंपरा आज भी कायम है। साथ ही एक माह तक मेला लगता है।

इसमें लकड़ी और लोहे के सामान बेचे जाते हैं। महाशय परिवार की ओर से बिना चंदा लिए दुर्गा पूजा संपन्न कराई जाती है। परिवार से जुड़े शेखर घोष ने बताया कि बंगाली पद्धति के द्वारा यहां पूजा-अर्चना होती है। 1975 तक बंगाल के कारीगर हारू दा की टीम की ओर से मूर्ति और पंडाल की सजावट होती थी। उनके निधन के बाद अब स्थानीय पारो कारीगर के द्वारा मूर्ति का निर्माण कराया जा रहा है। उन्होंने बताया कि 1604 में उनके पूर्वज यहां आ चुके थे। यहां पहली बार श्रीराम घोष के द्वारा दुर्गा पूजा की शुरुआत की गई थी, जो आज भी उनके परिवार के किसी सदस्य के द्वारा ही संचालित हो रही है। 

जमींदारी प्रथा खत्म होने के बाद पूजा में आया बदलाव  
शेखर घोष ने बताया कि पहले भागलपुर के लोग दुर्गा पूजा आने का इंतजार करते थे। पूजा के दौरान कई लोगों की जिंदगी में खुशहाली आती थी। यहां पहली से लेकर दशमी पूजा तक कंगली भोज का आयोजन होता था। साथ ही महाशय परिवार की ओर से गरीबों के बीच अनाज और भूमि दान में दी जाती थी। पूजा के दौरान सूफी-संतों का जमघट लगता था। वक्त के साथ अब यहां काफी बदलाव देखने को मिल रहा है। 

उन्होंने बताया कि 1952 में जमींदारी प्रथा समाप्त होने के बाद पूजा में बदलाव आया है। पहले यहां की अतिशबाजी देखने के लिए दूर-दराज से लोग पहुंचते थे। अब आतिशबाजी व सूफी-संतो का कार्यक्रम नहीं होता है। कंगली भोज का आयोजन भी नहीं होता। उन्होंने बताया कि महेश घोष, रवि घोष व लड्डू घोष आखिरी सेवायत थे। अब उनके परिवार के डॉ. डीछंदा घोष, राजू घोष व उनके द्वारा ही पूजा कराई जाती है। सामाजिक कार्यकर्ता देवाशीष बनर्जी ने दावा किया कि कोलकाता की काली व महाशय की डयूढ़ी की पूजा काफी विख्यात है। मां से सच्चे दिल से मन्नत मांगने पर जरूर पूरी होती है।

Sources:-Hindustan

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