राजनैतिक मौत के 12 साल बाद भी आम लोगों के बीच जिंदा रहे अटल बिहारी वाजपेयी

प्रेरणादायक

अटल बिहारी वाजपेयी की मौत 2006 में ही हो गयी थी। एक राजनेता अगर लोगों से मिल नहीं सकता, किसी मुद्दे पर बयान नहीं दे सकता तो वो उसके लिए मौत ही है।

अटल जी के करीबी प्रमोद महाजन की संदेहास्पद हत्या के बाद बीजेपी में अटल युग को खत्म कर दिया गया। निश्चित रूप से अटल जी आंशिक रूप से समावेशी सोच थे।

बीजेपी के उपर एक लंपट गिरोह का कब्जा हो गया जिसने पहले सोशल मीडिया को और फिर मेन स्ट्रीम मीडिया को मैनेज कर के राजनीति करनी शुरू कर दी।

पिछले 12 वर्ष में देश के 12 पत्रकारों ने भी अटल जी को नहीं पूछा। उनके जन्मदिन को छोड़कर कभी किसी TV प्रोग्राम में उनको नहीं दिखाया गया। कारण बस एक ही था भक्तो के भगवान को अटल की लोकप्रियता से डर था।

12 वर्ष में संघ और मोदी की बीजेपी ने हर वो काम किया जिससे अटल को लोग भूल जाए। अटल के प्रतिद्वंद्वी रहे दीनदयाल का महिमामंडन किया गया। अटल की सरकार गिराने वाले सुब्रह्मण्यम स्वामी सम्मान दिया गया। पूरे देश में ऐसे लोगों को पार्टी में लाया गया जो अटल के विरोधी थे। जगदंबिका पाल से लेकर गिरधर गमांग तक इसके उदाहरण हैं।

इतनी मजबूत IT सेल वाली पार्टी के पास अटल के नाम का एक पेज नहीं है। सोशल मीडिया में अटल के चर्चे भी कभी नहीं होते। लेकिन 12 वर्ष तक मीडिया से दूर रहने के बाद भी। उनकी मौत पर लाखों लोग जुटे। देश के हिंदी पट्टी के टियर 1और टियर 2 शहर में दुकानें कम खुले। आम लोगों में एक श्रद्धा का भाव दिखा।

यह संकेत है मोदी एंड कंपनी के लिए की आप के गलत प्रयासों से किसी की हस्ती नहीं मिट सकती है। उन्मादी भीड़ की राजनीति बहुत दिनों तक नहीं कर सकते हैं।

( सचिन झा शेखर के फेसबुक वॉल से )

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