पर्यावरण की चिंता : स्कूल में बच्चों से फीस के बदले प्लास्टिक का कचरा लिया जा रहा

कही-सुनी

असम की राजधानी गुवाहाटी में एक ऐसा स्कूल है जहां फीस के तौर पर बच्चों से प्लास्टिक कचरा लिया जाता है। स्कूल में आर्थिक रूप से कमजोर 100 से अधिक बच्चे पढ़ते हैं। स्कूल बच्चों और वहां के लोगों को प्लास्टिक से होने वाले नुकसान के प्रति जागरुक कर रहा है।

स्कूल में सभी बच्चे आर्थिक रूप से कमजोर

  1. ‘अक्षर’ स्कूल को 2016 में परमिता शर्मा और माजिन मुख्तर ने शुरू किया था। यहां आर्थिक रूप से कमजोर 110 बच्चे पढ़ते हैं। इनसे हर हफ्ते फीस के तौर पर प्लास्टिक के पुराने और खराब हो चुके 10 से 20 सामान मंगाए जाते हैं। साथ ही उन्हें प्लास्टिक न जलाने की सलाह दी जाती है।
  2. परमिता टाटा समाजिक विज्ञान संस्थान के गुवाहाटी सेंटर से मास्टर्स कर रही हैं। उन्होंने बताया, ‘‘हमारा स्कूल कई मायनों में बहुत अलग है। खासतौर पर हमने इसे गरीब बच्चों के लिए शुरू किया है। यहां गणित, विज्ञान, भूगोल के साथ व्यावसायिक कौशल की ट्रेनिंग भी दी जाती है।’’
  1. उन्होंने बताया, ‘‘हमारे स्कूल में ज्यादातर बच्चे स्कूल से निकाले हुए हैं। उनके माता-पिता उन्हें स्कूल भेजने में सक्षम नहीं थे। वे उन्हें पास के पत्थर खद्दान में कमाने के लिए भेजते थे। हमने उन्हें स्कूल जाने के लिए प्रेरित किया।’’
  2. माजिन न्यूयॉर्क में रहते थे। वे यहां स्कूल खोलने की योजना लेकर आए थे। उन्होंने कुछ समय तक लखीमपुर में दूसरे स्कूल के लिए काम किया। बाद में परमिता के साथ मिलकर उन्होंने गुवाहाटी के पामोही में ‘अक्षर’ स्कूल की शुरुआत की। परमिता असम से हैं। दोनों का शिक्षा के क्षेत्र में काम करना सपना था। दोनों ने 2018 में शादी कर ली।
  1. परमिता ने कहा, ‘‘हमने नोटिस किया कि लोग यहां प्लास्टिक का उपयोग ज्यादा करते हैं। प्लास्टिक न सिर्फ हमारे पर्यावरण के लिए हानिकारक है, बल्कि यह हमारे पारिस्थतिकी तंत्र को भी नुकसान पहुंचाता है। हमने लोगों को इसे नहीं जलाने के लिए कहा।’’
  2. बच्चों ने स्कूल के परिसर में बेकार प्लास्टिक से इको ब्रिक्स बनाई है और पौधों के लिए सुरक्षा घेरा तैयार किया है। परमिता ने कहा, ‘‘हम इन ईको ब्रिक्स का उपयोग स्कूल में टॉयलेट बनाने के लिए कर रहे हैं। साथ ही इनसे रास्ता बनाया है। स्कूल में पानी भर जाने के बाद बच्चे इसका उपयोग करते हैं। इन ईको ब्रिक्स की मदद से हमने परिसर की घेराबंदी भी की है।’’
  1. अक्षर स्कूल में एडमिशन के लिए पारंपरिक स्कूलों की तरह कोई उम्र की सीमा तय नहीं की गई है। उन्होंने कहा कि एडमिशन के समय दिए जाने वाले टेस्ट के आधार पर बच्चों का लेवल तय किया जाता है। स्कूल में हर शुक्रवार को टेस्ट होता है। 
  2. माजिन ने बताया, ‘‘हम बड़े बच्चों को छोटे बच्चों को पढ़ाने के लिए प्रेरित करते हैं। ‘अक्षर’ में हम पहली चीज सिखाते हैं, अच्छा शिक्षक बनना। स्कूल में सिंगिंग, डांसिग, सोलर पैनेलिंग, गार्डनिंग, ऑर्गेनिक फार्मिंग, कारपेंटर, कॉस्मेटोलॉजी, इलेक्ट्रोनिक्स और रिसाइक्लिंग के कोर्स होते हैं।

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