मिट्टी के दीपक, खिलौने और मूर्तियां बनाने वाले कुम्हारों ने पिछले कई माह से लगातार दिन रात मेहनत करके उसे सवांरने में लगे हुए हैं. लेकिन पिछले कुछ वर्षों से चाइनीज उत्पादों से मिल रही प्रतिस्पर्धा ने उनके मन में समान न बिक पाने का डर बना रखा है.

झारखंड के धनबाद में विभिन्न इलाकों के आलीशान बंगलों पर सजी चाइनीज लड़ियां बेशक लोगों के मन को खूब भाती हों, लेकिन इन बंगलों के नीचे भारतीय परंपरा को निभाते आ रहे कुम्हारों की माटी दबी पड़ी है.

ढाई से तीन हजार रुपए में चिकनी मिट्टी ट्राली रेत खरीदकर दिए बनाकर कुम्हार मुनाफा नहीं कमा रहा, बल्कि अपनी संस्कृति, रीति-रिवाज को जीवंत रखने का प्रयास कर रहा है.

आज से 10-15 वर्ष पहले जहां कुम्हारों को आस-पास की जगह से ही दिए बनाने के लिए चिकनी मिट्टी आसानी से मुफ्त में उपलब्ध हो जाती थी. वहीं, अब इस मिट्टी की मोटी कीमत चुकानी पड़ती है.

मिट्टी से तैयार एक- दो रुपए के दीपक को खरीदते समय लोग मोल-भाव भी करना नही भूलते हैं. कुछ लोग तो समझदारी दिखाते हैं, लेकिन कुछ की दीपावली चाइनीज झालरों के सहारे संपन्न हो जाती है.

Sources:-Zee News

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