धर्म और संस्कृति की वाहक हैं मिथिला की पंजी और पांडुलिपियां, इनके संरक्षण के लिए उठाए जा रहे ये कदम

आस्था जानकारी

जब तक देश में धर्म एवं संस्कृति जीवित रहेगी तब तक मिथिला की पंजी का महत्व बना रहेगा। यह बात मिथिला के प्रसिद्ध पंजीकार प्रो. कालिकादत झा ने कही। इन्टैक की ओर से मिथिला की पंजी एवं पांडुलिपियों के संरक्षण का काम शुरू हो गया है। वे महाराजाधिराज लक्ष्मीश्वर सिंह संग्रहालय परिसर में इसके शुभारंभ के मौके पर बोल रहे थे।

संरक्षण कार्य का शुभारंभ मिथिला के प्रसिद्ध पंजीकारों व अन्य बुद्धिजीवियों ने सामूहिक रूप से किया। प्रसिद्ध मैथिली अभियानी डॉ. बैद्यनाथ चौधरी बैजू ने कहा कि मिथिला की पांडुलिपियों को बचाने के लिए हरसंभव प्रयास किया जाएगा। प्रसिद्ध पंजीकार प्रो. जयानंद मिश्र ने अपनी सात पंजी पोथियों को संरक्षण के लिए समर्पित करते हुए कहा कि मिथिला के सभी पंजीकारों को इस विषय पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। इसके लिए सौराठ में संगोष्ठी का आयोजन किया जाएगा। प्रो. मिश्र ने कहा कि पहले ब्राह्मण के अलावा कायस्थ, राजपूत, वैश्य आदि जातियों की भी पंजी थी, लेकिन वर्तमान समय में इसके प्रति उपेक्षा भाव चिंताजनक है।

इन्टैक, बिहार स्टेट चैप्टर के को-कनवेनर भैरव लाल दास ने कहा कि इन्टैक द्वारा मिथिला के पंजीकारों एवं पांडुलिपियों के अन्य कस्टोडियन के साथ विमर्श करने एवं आम लोगों में पंजी के प्रति जागरूकता पैदा करने के लिए सौराठ, मधुबनी एवं सरिसबपाही में जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। प्रसिद्ध साहित्यकार प्रो. वीणा ठाकुर ने इन्टैक के संरक्षण कार्यों की सराहना करते हुए इस कार्यक्रम से लाभ उठाने का लोगों से आग्रह किया। संग्रहालयाध्यक्ष डॉ. शिव कुमार मिश्र ने संग्रहालय की पांडुलिपियों को संरक्षण के लिए समर्पित करते हुए मिथिला के पंजीकारों एवं अन्य लोगों से आग्रह किया कि अपना पंजी एवं पांडुलिपि संरक्षण के लिए संग्रहालय के इस लैब में जमा करें तथा संरक्षण के बाद वापस ले जाएं।

 

वरिष्ठ इतिहासकार डॉ. अवनींद्र कुमार झा ने अपने पूर्वजों के संगृहीत पांडुलिपियां संग्रहालयाध्यक्ष को समर्पित की थी। डॉ. मिश्र ने अन्य विद्वानों से भी संग्रहालय को अपनी पांडुलिपि दान करने का आग्रह किया। सरिसबपाही के संरक्षण विशेषज्ञ अमल झा ने महामहोपाध्याय डॉ. सर गंगानाथ झा का दुर्लभ हस्तक्षेप संरक्षण के लिए समर्पित की।

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