सड़कों पर सरपट दौड़ती जिंदगी इस वक्‍त एकदम शांत हो गई है। कुछ भी बात हो जाए, हालात कितने ही विपरीत हो जाएं लेकिन जिंदगी की दौड़ कभी थमती नहीं थी लेकिन एक वायरस ने जैसे हर सोच, हर विचार और हर दौड़ को थाम कर रख दिया है। दौड़ती भागती जिदंगी संशय की स्थिति में कैद हो गई है। ऐसा नहीं है कि कोरोना वायरस के खिलाफ जंग लड़ने को लोगों ने उपाए नहीं किये थे। दिसंबर 2019 में जब से कोरोना वायरस ने चीन को अपनी गिरफ्त में लेना शुरु किया तब से भारत में भी लोग बचाव के तमाम उपाय तलाशने लगे।

लेकिन तमाम उपायों से इतर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा जनता कर्फ्यू के दौरान किया गया घंटे और शंख ध्‍वनि बजाने का आहवान सबसे अलग था। हां बेशक लोग अचरज में थे कि ऐसा क्‍या हो जाएगा सिर्फ घंटे बजाने और शंखनाद करने से कोरोना के खिलाफ कैसे जंग जीती जाएगी। एक दिन के इस प्रयास से क्‍या हुआ ये उन लोगों से पूछना चाहिए जिन्‍होंने इसे किया और इसके बाद मिली शारीरिक और मानसिक ऊर्जा को महसूस किया। धर्म विज्ञान शोध संस्‍थान, उज्‍जैन के निदेशक डॉ जे जोशी से जागरण डॉट काम ने एक दिन के प्रयास के महत्‍व पर फोन से बात की। डॉ जे जोशी का इस बाबत कहना था कि घंटे और शंखनाद का ध्‍वनि का विज्ञान है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा पूरी तरह से सनातन धर्म विज्ञान पर विश्‍वास रखते हुए देशवासियों से ये आहवान किया गया था। ध्‍वनि का विज्ञार इतना विस्‍तृत है कि यदि इसे प्रतिदिन की दिनचर्या में शामिल कर लिया जाए तो कोरोना जैसे तमाम वायरसों का काम तमाम किया जा सकता है।

बर्लिन में हो चुका है शंख ध्‍वनि पर शोध
डॉ जे जोशी ने बताया कि बर्लिन विश्‍वविद्यालय में शंख ध्‍वनि के संबंध में 1928 में एक उपयोगी अनुसंधान हो चुका है। जिसमें शंख ध्‍वनि को विषाणु नष्‍ट करने की उत्‍तम औषधि बताया गया है। प्रति सेंकंड 27 घनफुट वायु शक्ति के जोर से बजाया हुआ शंख 1200 घनफुट दूर तक कीटाणुओं को नष्‍ट करता है। और लगभग 2600 फुट तक की दूरी के कीटाणु इस ध्‍वनि से मूर्छित हो जाते हैं। शंख ध्‍वनि से हैजा, टीबी आदि बैक्‍टीरिया से फैलनेे वाले रोग ठीक हो जाते हैं।

धार्मिक महत्‍व
सनातन धर्म में साधक आसपास के वातावरण को शुद्ध करने हेतु उपासना से पहले शंख ध्‍वनि करते हैं ताकि वातावरण का दुष्‍प्रभाव नष्‍ट हो और साधक का शरीर विषाणुओं से मुक्‍त हो सके। डॉ जे जोशी के अनुसार शंख ध्‍वनि के लगातार अभ्‍यास करने से शब्‍दोच्‍चार दोष समाप्‍त हो जाते हैं। मंत्रों में शब्‍दोच्‍चार दोष होने पर उनकी आवृत्ति में परिवर्तन होने से साधक की साधना निष्‍फल होती है। इसलिए साधक मंत्र साधना से पूर्व शंख ध्‍वनि करते हैं।

स्‍वास्‍थ्‍य के लिए महत्‍व
डॉ जे जोशी कहते हैं कि आसपास के विषाणुओं को नष्‍ट करने के साथ ही शंखध्‍वनि हकलाने, अटक कर बोलने की परेशानी में बहुत कारगार है। शंख बजाने से ये परेशानियां खत्‍म होती हैं।

ऐसे करता है शंख काम
शंख केल्शियम श्रंखला के प्राणी अपनी सुरक्षा के लिए बनाते हैं। शंख के अंदर पाए जाने वाले वलय और उसमें स्थित कंगुरे श्‍वास गति के प्रभाव से आवेश उत्‍पन्‍न करते हैं। यह आवेश ध्‍वनि ऊर्जा के माध्‍यम से वातावरण में विसरित हो जाता है। बाहरी वातावरण के विषाणु नष्‍ट हो जाते हैं और साधक के लगातार प्रयास से श्‍वासोच्‍छावास की गति बढ़ जाती है। रक्‍त संचरण तेजी से होने लगता है। यह संचार क्षमता व्‍यक्ति को स्‍फूर्ति प्रदान करती है। शंख के अलग अलग प्रकार अलग अलग आवृत्तियों को उत्‍पन्‍न करते हैं। महाभारत काल में पंच्‍यजन्‍य शंख का वर्णन है। इस तरह के शंख युद्धकाल में उपयोग में लाए जाते थे। ये शंख घोर ध्‍वनि आवृत्ति के होते थे। जिनके द्वारा संहार, वर्षा आदि संभव थी।

शंखध्‍वनि का प्रभाव

शंख को रोज बजाना एक प्रकार का प्राणायाम कहलाता है। इससे शरीर रोग तो नष्‍ट होते ही हैं साथ ही मानसिक विकास भी होता है। तनाव दूर होता है। श्‍वांस, फेफड़े आदि की बीमारी नहीं होती। यदि बीमारी है तो ये उपचार संभव होता है।

घंटा ध्‍वनि का विज्ञान
हर मंदिर में घंटे लगे होते हैं। आम घरों में भी पूजा अर्चना के दौरान छोटे घंटे का उपयोग किया जाता है। डॉ जे जोशी बताते हैं कि मंदिर में लगे घंटे की ध्‍वनि की ईकाई डेसीबल होती है। जब भी व्‍यक्ति मंदिर पहुंचता है तो अनजाने में उसके हाथ घंटा ध्‍वनि को जागृत करने की चेष्‍टा करने लगता है। भले वो सोचता है कि वो भगवान को अपने आने की सूचना दे रहा है जबकि वास्‍तव में वो खुद का उपचार कर रहा होता है। जी हां, उपचार। अदृश्‍य पराबैंगनी किरणें जिस तरह मनुष्‍यों की विभिन्‍न रोगों से रक्षा करती हैं, उसी प्रकार कंपन के स्‍पंदन से पैरासौनिक ध्‍वनि की आवृति से हानिकारक जीवाणु तुरंत ही मृत हो जाते हैं। इसी प्रकार यदि शरीर में रोगाणुओं की उपस्थिति होती है तो वो तुरंत साफ हो जाते हैं। यह क्रिया जब होती है तब घंटा ध्‍वनि करते ही हम दो सेकंड उस घंटाल के नीचे खड़े रहें। यदि घंटाल आवृत्ति के पश्‍चात हम उसके नीचे खड़े नहीं होंगे तो उपचार नहीं हो सकेगा। इसकी तीव्रता हमारे शरीर को हानि भी पहुंचा सकती है। अधिक मात्रा में घंटा ध्‍वनि शोर बनकर पीड़ा का कारण हो सकती है। प्रात:काल घंटा ध्‍वनि की आवृत्ति ग्रहण करने से व्‍यक्ति दीर्घायु होता हे। उसे दिल के रोग नहीं होते।

ऐसे होती है घंटा ध्‍वनि प्रभावी
20 से 25 डेसीबल के हल्‍के स्‍ट्रोक के साथ घंटा ध्‍वनि कंपन करे, उस समय उसके नीचे खड़े हो जाएं तो पेट संबंधि रोग, अल्‍सर, एंठन, अनिंद्रा आदि में आराम मिलता हे। 120 से 125 डेसीबल ध्‍वनि की आवृत्ति और 130 से 140 डेसीबल की आवृत्तियां अधीरता और तनाव भी पैदा कर सकती हैं। घंटा ध्‍वनि एक बार केवल 100 डेसीबल से नीचे हल्‍की आवाज में ही करनी चाहिए। पश्चिमी देश ध्‍वनि से क्षय रोग के उपचार का अनुसंधान कर रहे हैं। दक्षिण अफ्रीका के लोग घंटा ध्‍वनि बजाकर सांप के काटे का उपचार करते हैं।

SOURCE – DAINIK JAGRAN

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