chhath puja tradition

क्या आपको पता है… इन वजहों से रामायण और महाभारत काल से है छठ पूजा की परंपरा

आस्था

सूर्य ऐसे देवता हैं जिन्हें मूर्त रूप में देखा जा सकता है। सूर्य की शक्तियों का मुख्य श्रोत उनकी पत्नी ऊषा और प्रत्यूषा हैं। छठ पूजा में सूर्य के साथ इन दोनों शक्तियों की संयुक्त आराधना होती है।

प्रात: काल में सूर्य की पहली किरण (ऊषा) और सायंकाल में सूर्य की अंतिम किरण (प्रत्यूषा) को अर्घ्य देकर दोनों को नमन किया जाता है।

 

सूर्य की उपासना का उल्लेख पहली बार ऋगवेद में मिलता है। इसके बाद अन्य सभी वेदों के साथ उपनिषद में सूर्य पूजा का उल्लेख है। पौराणिक काल में सूर्य को आरोग्य का देवता माना जाता था।

सूर्य की किरणों में रोगों को नष्ट करने की क्षमता होती है। माना जाता है कि गायत्री मंत्र के सृष्टा ऋषि विश्वामित्र के मुख से गायत्री मंत्र कार्तिक शुक्लपक्ष की षष्ठी तिथि को ही फूटा था।

chhath puja tradition

कहा जाता है कि जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गए, तब द्रौपदी ने छठ व्रत रखा। उनकी मनोकामना पूरी हुई और पांडवों को राजपाट वापस मिला। एक अन्य मान्यता के अनुसार लंका पर विजय के बाद रामराज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम और माता सीता ने उपवास रखा और सूर्यदेव की आराधना की।

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एक मान्यता के अनुसार छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल में हुई। इसका आरंभ सूर्य पुत्र कर्ण ने सूर्य की पूजा कर किया था। सूर्यदेव की कृपा से ही वह महान योद्धा बने। मान्यता है कि छठ देवी, सूर्यदेव की बहन हैं, इसलिए छठ पर्व पर छठ देवी को प्रसन्न करने के लिए सूर्य देव को प्रसन्न किया जाता है।

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