समानता की मिसाल है छठ पूजा, पुरोहित के बजाय डोम-कुम्हार की है महत्ता

आस्था

Patna: लोक आस्था का महापर्व छठ पूर्वांचल का सबसे बड़ा लोकपर्व है. छठ पूजा एक ऐसी पूजा है, जो समाज की कुरीतियों की दीवार को तोड़ कर समानता की मिसाल पेश करती है. इस पूजा में सभी जाति के लोगों की भागीदारी होती है. इस महापर्व में पुरोहित की कोई परंपरा नहीं है. भक्त यानी व्रती छठी माता से खुद जुड़ते हैं.

इसके साथ ही इसमें कोई मंत्र भी नहीं होता. हर वर्ग पूरी श्रद्धा के साथ छठ पर्व में शामिल होता है.

डोम जाति के लोग बनाते हैं सूप-दउरा
समाज ने अपने पैरामीटर में डोम जाति को अछूत बना रखा है. लेकिन छठ पूजा बिना सूप, डलिया आदि के नहीं होती. इसलिए व्रती ये सूप और दउरा डोम से ही लेते हैं. पूजा में इस तरह इन जातियों को सामाजिक एकता में अपनी आस्था जाहिर करने का एक मौका मिलता है. बांस से बने सूप की शुद्धता ही छठ की खासियत है और इससे पूजा इको फ्रेंडली (Eco Friendly) भी बनती है. डोम जाति के लोग इसकी तैयारी कई दिनों पहले से करते हैं.

मिट्टी के चूल्हे भी पिछड़ी जाति के लोग बनाते हैं
यूं तो कुम्हार जाति (जो मिट्टी के बर्तन बनाते हैं) समाज की पिछड़ी जातियों में गिनी जाती रही है, लेकिन इस पर्व में उनकी बड़ी भागीदारी होती है. कोसी भरने से लेकर हाथी और दीया तक ये कुम्हार बना कर देते हैं. इनके बनाए मिट्टी के चूल्हे पर छठ के प्रसाद, कद्दू-भात, रसिया-पूड़ी, ठेकुआ, कसर-लड्डू आदि बनाए जाते हैं.

डूबते सूर्य को अर्घ्य
उगते सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा और भी पूजा में है. लेकिन छठ पूजा एक ऐसा त्योहार है, जिसमें डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है. छठ पूजा की बड़ी खासियत यह भी है कि इसमें उगते सूर्य को तो जल अर्पण करते ही हैं, डूबते सूर्य को भी अर्घ्य देते हैं. छठ पूजा की यह समानता छठ घाट पर भी देखने को मिलती है. 

Source: Zee News

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