पूरी पृथ्वी का केंद्र बिंदु माना जाता है बिहार के इस मंदिर को, बुद्ध को यहीं हुई थी ज्ञान की प्राप्ति

आस्था

राजकुमार सिद्धार्थ बोधगया प्राचीन उरूवेला में ही 2605 साल पहले सम्यक सम्बुद्ध बने थे। सिद्धार्थ ने जब घर छोड़ दिया था तो मन की शांति में वैशाली और राजगृह के कई जगह और शिक्षक से संपर्क किया।उन्हें मन की शांति और ज्ञान बोधगया में ही मिली। ये प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि उन्हें बोधगया में ही ज्ञान की प्राप्ति क्यों हुई?

बौद्ध विद्वान अश्वघोष ने बुद्धचरित में वज्रासन को पृथ्वी की नाभि व केंद्र बताया है। भारतीय अध्यात्म में नाभि को ज्ञान का केंद्र माना गया है। उन्होंने वज्रासन को एकमात्र ऐसा स्थल बताया है, जहां साधना के द्वारा ज्ञानोदय संभव है।

पांचवीं सदी में भारत आए चीनी यात्री फाह्यान ने अपने वृतांत में वज्रासन की जानकारी देते हुए कहा है कि यही वह स्थल है, जहां सभी पूर्ववर्ती बुद्धों को संबोधि की प्राप्ति हुई थी व आनेवाले सभी बुद्धों को भी यहीं संबोधि की प्राप्ति होगी।

13वीं सदी में भारत आए तिब्बती यात्री धर्मस्वामी ने भी वज्रासन से बुद्धत्व प्राप्ति को जोड़ा है। बोधगया में अभी भी भूमि स्पर्श मुद्रा की कई मूर्तियां संरक्षित हैं। यह मुद्रा संबोधि प्राप्ति व वज्रासन का प्रतीक है। माना जाता है कि भगवान बुद्ध ने अपने दाहिने हाथ से भूमि का स्पर्श करते हुए उसे अपने ज्ञान प्राप्ति का साक्षी बनाया था।

भगवान बुद्ध के बोधिवृक्ष के नीचे पेड़ के चबूतरे पर बैठने का उल्लेख है, जिसे वज्रासन माना गया। वह ईंट से निर्मित था, जिसके ऊपर सम्राट अशोक ने सैँडस्टोन का स्लैब लगवाया था। उसने जिस बोधि मंडप का निर्माण करवाया था, उसकी तस्वीर भरहुत स्तूप से मिलती है।

उसमें भी वज्रासन प्रमुखता से प्रदर्शित है। वर्तमान मंदिर के जीर्णोद्धार के दौरान मंदिर के पश्चिमी दीवार के किनारे मौर्यकालीन ईंट मिली है, जिससे इसकी पुष्टि होती है।

1872 में महाबोधि मंदिर का जीर्णोद्धार शुरू करने के दौरान कनिंघम को बोधिवृक्ष के नीचे वज्रासन मिला, जो धूसर रंग के सैंडस्टोन से निर्मित है। वज्रासन सात फुट साढ़े 10 इंच चौड़ा, चार फुट साढ़े सात इंच लंबा व साढ़े छह इंच मोटा है।

सतह पर ज्यामितीय डिजायन बने हैं, मध्य में चक्राकार डिजायन है। चारों कोने पर कबूतर, बत्तख व फूल बने हैं। यह वज्रासन तीन फुट चार इंच उंचे ईंट के प्लेटफॉर्म पर रखा है।

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