बुलेट ट्रेन के साथ भारत नये युग मेँ..

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अहमदाबाद से मुम्बई के बीच की बुलेट ट्रेन योजना की औपचारिक शुरुआत के साथ ही परिवहन के मामले मेँ भारत एक नए युग मेँ दाखिल हो गया है। और जितनी तैयारी दिख रही है उससे साफ लगता है कि भारत और जापान, दोनोँ सरकारेँ इस परियोजना को 2023 के डेटलाइन से पहले पूरी करने जा रही हैँ।

मोदी जी ने भी बडी सुविधा से अब सारे लक्ष्य 2019 की जगह 2022 बताने शुरु कर दिये हैँ जो हमारी आजादी की 75 वीँ वर्षगांठ है। वे इस रेल की शुरुआत भी 15 अगस्त 2022 से करना चाहते हैँ। अब उन्हे देश दोबारा मौका देगा या नहीँ यह तो भविष्य की बात है पर इस परियोजना के रास्ते मेँ भी अभी कम बाधायेँ नहीँ हैँ। एक बडी बाधा तो अलग स्टेशन बनाने एक लिये जमीन की उपलब्धता ही है जिसे मुम्बई ने लाख नखरे दिखाने के बाद अब मंजूर किया है।

 

पर बान्द्रा की जो जमीन दी गई है उसे भी काफी छोटी माना जा रहा है।खैर. असली चीज है बुलेट ट्रेन चलने की और इसे शुद्ध रूप से मोदी का सपना कहने मेँ हर्ज नहीँ है। यह सही है कि यह चर्चा अटल बिहारी वाजपेयी जी के समय शुरु हुई थी। यह भी सही है कि 2011 मेँ जापान के साथ हुए 55 सूत्री समग्र सन्धि मेँ सहयोग के नए युग की शुरुआत हुई और वार्षिक शिखर बैठक का सिलसिला शुरु हुआ था।

यह भी सही है कि शिंजो एबे के साथ मनमोहन सिन्ह का सम्बन्ध भी बहुत अच्छा था, पर मोदी इस रिश्ते को नई ऊंचाई तक ले आए हैँ। पिछले तीन साल मेँ ही उनकी जापानी प्रधानमंत्री से लगभग एक दर्जन बार मुलाकात हो चुकी है। और अब यह रिश्ता इस स्तर पर आ गया है कि मोदी उन्हेँ बनारस की आरती मेँ शामिल कराना चाहते हैँ तो वे उसमेँ भी जाते हैँ और अहमदाबाद की सिदी मस्जिद दिखाना चाहते हैँ तो वहाँ भी जाने मेँ गुरेज नहीँ करते।

 

मोदी मियाँ-बीबी की पोशाक बदलवाना चाहते हैँ तो वे यह काम भी खुशी-खुशी करते हैँ और आठ किमी के रोडशो मेँ ले जाते हैँ तो वह भी कर देते हैँ। चाहने को तो हम सब कुछ चाहते हैँ पर सामने वाला आपकी इच्छा देखकर उसे पूरी कर दे यह ज्यादा महत्वपूर्ण है। बुलेट ट्रेन के आने से क्या-क्या लाभ होंगे यह गिनवाना एक बात है पर असली चीज है इसके आने की शर्तेँ।

एक लाख दस हजार करोड मेँ से करीब नब्बे हजार करोड पचास साल के लिये उधार मिल जाए जाएँ तो प्रोजेक्ट मेँ बाधा नहीँ आनी चाहिये। 0.01 फीसदी का सूद, पहले पन्द्रह साल कोई देनदारी नहीँ और पचास साल की अवधि चीजोँ को काफी हल्का बना देता है।

 

अब इस योजना को लेकर रेल मंत्री पियुष गोयल या खुद प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी जो-जो सपने दिखा रहे थे और जिस-जिस तरह की उपलब्धियोँ की बात कर रहे थे, उन सबकी सफाई जरूरी नहीँ है, ना उनको गिनवाने का लाभ है। वे तो ये बातेँ अपने एक और सपने- न्यू इंडिया के सन्दर्भ मेँ भी रख रहे थे।

पर इतना जरूर है कि बुलेट ट्रेन का चलना भारत मेँ एक नए दौर की शुरुआत है। परिवहन की गति बढने के साथ जिन्दगी और कामकाज की गति बढेगी ही। नई तकनीक और कार्य संस्कृति सिर्फ बुलेट ट्रेन तक आकर नहीँ रुकेगी-वह अन्य क्षेत्रोँ, खासकर रेल मेँ पसरेगी ही।

जो प्रशिक्षण बुलेट ट्रेन के लिये होगा वह बाकी क्षेत्रोँ मेँ जाएगा ही। फिर बुलेट अहमदाबाद और मुम्बई का जितना भला करेगी उससे ज्यादा आनन्द, वसई, सूरत, बडोदरा जैसे अपेक्षाकृत छोटे लेकिन ज्यादा तेजी से विकास करते शहरोँ के लिये ज्यादा उपयोगी होगा, जहाँ पहुंचना अभी मुश्किल है या इन्ही बडे शहरोँ पर आश्रित है। इस तकनीक के देसीकरण और स्थानीय उत्पादकोँ के सहयोग का प्रावधान देसी उत्पादकोँ को क्वालिटी और समयबद्धता का पाठ भी पढाएगा ही।

 

पर जब हमारी सामान्य रेल सेवा आधुनिकीकरण और सुरक्षा के मामकोँ पर बार-बार फेल हो रही है, कोई भी हफ्ता बिना रेल हादसे के नहीँ बीत रहा है, इसी एक चलते नरेन्द्र मोदी को अपने सबसे कुशल रेलमंत्री सुरेश प्रभु को विदा करना पडा हो तब यह विचार भी अनुचित नहीँ है कि 508 किमी के रेल पर एक लाख दस हजार करोड खर्च करना पहली प्रामिकता होना चाहिये या या बाकी मुख्य लाइनोँ को सुधारना।

यह सामान्य हिसाब है कि बुलेट ट्रेन का अंडरग्राउंड हिस्सा तीन सौ करोड रुपये प्रति किमी बनेगा और ऊपर का हिस्सा भी 230 करोड रुपये किमी तब पुराने रेल मार्गोँ को दो से तीन करोड रुपए खर्च करके नया बनाना ज्यादा समझदारी का होता या नहीँ यह सवाल भी विचारणीय है। यह माना जाता है कि हमारी सामान्य एक्सप्रेस गाडियाँ औसतन 54-55 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चलती हैँ और राजधानी/शताब्दी 85 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से।

 

अगर ट्रैक दुरुस्त होँ तो इनकी गति सौ से दो सौ किमी करना असम्भव नहीँ है। और अगर पांच हजार किमी मार्ग को ही 15 से 20 हजार करोड के खर्च से दुरुस्त कर दिया जाए तो रेलवे की तस्वीर बदल जाएगी। जाहिर तौर पर हमारे रेल मंत्रियोँ की दिलचस्पी अपने इलाके मेँ नई गाडियाँ दौडाने मेँ ज्यादा रही है, सुरक्षा और आधुनिकीकरण के लिये धन का इंतजाम करने मेँ कम।

इस मामले मेँ मोदी सरकार भी अपवाद नहीँ है. पर इस रेल के दूसरे बडे फायदे भी हैँ, जिनकी अनदेखी नहीँ की जा सकती। अभी इस रेल परियोजना का शिलान्यास हो इससे पहले ही चीन ने प्रतिक्रिया दी है और याद दिलाया है कि इसी क्षेत्र मेँ भारत ने उससे भी समझौता किया हुआ है। चीन ने याद दिलाया है कि भारत उसका आदर करे।

पर बुलेट ट्रेन के मामले मेँ दुनिया मेँ सबसे बडा नेटवर्क रखन वाले चीन की चिंता सिर्फ व्यापार और करार की नहीँ है। वह जापान से हमारी मजबूत दोस्ती को भी अपनी कूटनीति मेँ बाधक मानता है। चीन एशिया या विश्व मेँ हमारा किस तरह का दोस्त है, पाकिस्तान से लेकर हर मामले पर किस तरह की ‘दोस्ती’ निभाता है यह गिनवाने की चीज नहीँ है।

पर जापान भी उत्तर कोरिया के परमाणु परीक्षण और अपने यहाँ फुकोशिमा दाएची परमाणु दुर्घटना के बाद बेचैन है। उसकी परमाणु तकनीक बिक नहीँ रही है और दुनिया मेँ परमाणु ऊर्जा से बचने का चलन जोर पकड रहा है। ऐसे अगर भारत उसका सामरिक दोस्त और खरीदार बन रहा है तो उसको भी इस दोस्ती से काफी लाभ है। दोस्ती एकतरफा होती भी नहीँ। बुलेट ट्रेन अभी भले जापानी उपहार बताई जा रही हो पर व्यापार मेँ जापानी गुजरातियोँ से पीछे नहीँ हैँ।

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