ब्लड बैंक में बर्बाद होने वाले खून से… बच सकती है 40 बच्चों की जान, DM की पहल पर मांगी गई यह मशीन

जानकारी

अब जल्द ही ब्लड बैंक से थैलेसीमिया के बच्चों को चढ़ाने के लिए छोटे बैग में खून मिलेगा. इसके लिए सुपौल डीएम के निर्देश पर सिविल सर्जन ने स्वास्थ्य विभाग को पत्र भेजा है. इस बैग के ब्लड बैंक में पहुंचने के बाद बच्चों के लिए अलग से छोटे बैग में ब्लड को पैक किया जाएगा. इसके लिए ऑटोमेटिक मशीन की आवश्यकता है. छोटे बैग के साथ ही स्वास्थ्य विभाग द्वारा इस मशीन की भी आपूर्ति जल्द की जाएगी. यह जानकारी सिविल सर्जन डॉक्टर ललन कुमार ने दी.

सीएस ने बताया कि ब्लड बैंक में जो भी दाता रक्तदान करते हैं, उनसे 300 एमएल ब्लड 350 एमएल के बैग में खून लिया जाता है. इसमें पचास एमएल प्लाज्मा सहित अन्य तत्व पहले से मौजूद होते है. इन सब को मिलाकर यह ब्लड साढ़े तीन सौ एमएल हो जाता है. जिले के थैलेसीमिया रोग से पीड़ित दस साल तक के बच्चों को हर माह सौ एमएल खून नियमित रूप से चढ़ाना होता है.

बर्बाद हो जाता है 250 एमएल खून
बताया गया कि 100 एमएल का बैग और बड़े बैग से 100 एमएल के बैग में सुरक्षित तरीके से खून पैक करने के लिए ऑटोमेटिक मशीन की आवश्यकता होती है. लेकिन ब्लड बैंक में यह दोनों उपलब्ध नहीं है. लिहाजा बच्चों को जरूरत पड़ने पर बड़े बैग 350 एमएल बैग की ही आपूर्ति की जा रही है. वहीं, छोटे बैग उपलब्ध नहीं होने की वजह से प्रति बच्चा 100 एमएल खून चढ़ाए जाने के बाद बड़े बैग में बचा शेष 250 एमएल खून बर्बाद हो जाता है. इसी को देखते हुए छोटे बैग और ऑटोमेटिक मशीन के लिए स्वास्थ्य विभाग को पत्र लिखकर मांग की गई है.

40 बच्चों की बच सकती है जान
बता दें कि जिले में वर्तमान में थैलेसीमिया रोग से पीड़ित 16 बच्चे हैं. इस हिसाब से हर महीने थैलेसीमिया के पीड़ित बच्चों को ब्लड उपलब्ध कराने में 4 लीटर खून बर्बादी हो रही है. इससे थैलेसीमिया के 40 पीड़ित बच्चों या 11 व्यस्कों को खून चढ़ाया जा सकता है.

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