बीजों को रोगमुक्त कर अधिक उत्पादक बनाएंगे हल्दी के गुणकारी पत्ते, देश में पहली बार चने के पत्तों पर प्रयोग सफल

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सिर्फ हल्दी की गांठ ही उपयोगी नहीं है, इसके पत्तों में भी कई गुण पाए जाते हैं। किसान अक्सर हल्दी के पत्तों को बेकार समझकर फेंक देते हैं। अब इन पत्तों से चने के बीजों का उपचार किया जाएगा। बिहार कृषि विश्वविद्यालय की विज्ञानी कुमारी रजनी पांच साल से इसपर अनुसंधान कर रही थीं। अब यह प्रयोग सफल हो गया है।

हल्दी के पत्तों के चूर्ण का उपयोग कर चना के बीजों को रोगमुक्त बनाया जाएगा। इस विधि से आठ की जगह चार दिनों में ही बीज अंकुरित हो जाएंगे। साथ ही उगने वाले सभी पौधों का आकार एक ही होगा। उत्पादन में भी 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी होगी। चने के बीजों पर सफलता मिलने के बाद अब अन्य फसलों को भी इस प्राकृतिक उपचार का लाभ देने पर शोध चल रहा है।

सामान्यतया बीजों से 70-75 प्रतिशत के आसपास पौधे निकलते हैं। इस तकनीक से 90 से 95 प्रतिशत तक पौधे निकलते हैं। हल्दी के पत्तों में भी इसकी गांठों की तरह करक्यूमिन केमिकल कंपाउंड रहते हैं। ये बहुत अधिक सक्रिय रहते हैं और चने के बीजों की गुणवत्ता को बढ़ा देते हैं। ऐसा उपचार पाए चने के पौधों में रोग लगने की आशंका भी बहुत कम होती है।

तकनीक खोजने वाली विज्ञानी कुमारी रजनी कहती हैं कि अब इसका प्रयोग मसूर आदि के बीजों पर भी किया जा रहा है। राज्य सरकार से हरी झंडी मिलते ही बिहार के किसानों को इस तकनीक से अवगत कराने का काम शुरू किया जाएगा। इन्हें प्रशिक्षित भी किया जाएगा। पूरे देश के किसानों को इसका लाभ हो, इसके लिए राज्य सरकार यह तकनीक केंद्र सरकार को भी भेजेगी। इस आसान, सस्ती और किसानोपयोगी तकनीक के पूरे देश के किसानों के लिए जारी होने की प्रबल संभावना है।

किसान ऐसे कर सकते हैं प्रयोग : कुमारी रजनी ने बताया कि इस काम के लिए किसी भी किस्म की हल्दी के पत्तों का उपयोग किया जा सकता है। जब हल्दी की फसल 90 दिनों की हो जाए, तब उसके पत्ते तोड़े जाते हैं। इससे पहले तोड़ने पर हल्दी की गांठें सही से विससित नहीं हो पाती हैं। हां, पत्ते 90 दिनों के बाद उस समय जरूर तोड़ लिए जाने चाहिए, जब वे हरे हों।

इसके पत्तों को छाया में कुछ दिनों तक सुखाकर फिर इसे ओवन में हल्का गर्म किया जाता है, ताकि नमी निकल जाए। यदि किसानों के पास ओवन नहीं हो तो इसे कमरे के तापमान पर पंखे की हवा में कुछ दिनों तक सुखा लें। धूप में या अधिक तापमान पर नहीं सुखाना चाहिए। इससे केमिकल कंपाउंड के नष्ट होने का खतरा रहता है। कुरकुरा होने के बाद इसका चूर्ण बना लिया जाता है।

10 ग्राम चूर्ण को एक लीटर पानी में रातभर डालकर छोड़ दिया जाता है। सुबह इस घोल को छान लिया जाता है। इसके बाद बीज को सिंगल लेयर में बिछाकर इसके ऊपर घोल में कपड़ा भिगोकर उसे ढक दिया जाता है। इसे 18 घंटे तक छोड़ दिया जाता है। कपड़े पर बीच-बीच में घोल के छींटे मारते रहना चाहिए, ताकि बीज भीगे हुए रहें।

इसके बाद इन बीजों को दो दिनों तक सुखाया जाता है। तब इसकी बोआई की जाती है। इससे, सभी बीजों में एक साथ अंकुरण होता है और चने के सभी पौधे एक ही आकार के होते हैं। एक हेक्टेयर में खेती के लिए चने के 80 किलोग्राम बीज चाहिए। इसमें 400 ग्राम चूर्ण की आवश्यकता होगी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस तकनीक का इस्तेमाल करने में किसानों को कोई खर्च भी नहीं करना पड़ेगा।

 

नई तकनीक काफी आसान, सस्ती व सुलभ है। किसान इसे आसानी से अपनाकर उत्पादन बढ़ा सकेंगे। इससे किसानों की आय बढ़ेगी। आने वाले समय में किसानों को प्रशिक्षण के माध्यम से तकनीक उपलब्ध कराई जाएगी।

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