सदियों से पर्यावरण संरक्षण का संदेश दे रहा बिहार का लोक पर्व मधुश्रावणी

आस्था

 वैसे तो सभी पर्व प्रकृति आधारित होते हैं। जब जब प्रकृति में बदलावा दिखता है तब तब कोई ना कोई पर्व अवश्य मनाया जाता है। लेकिन बिहार के मिथिला क्षेत्र में नव विवाहिताओं का महापर्व मधुश्रावणी एक ऐसा ही पर्व है जिसमें व्रती को सीधे प्रकृति से जोड़ा जाउसे प्रकृति के पास लाती है। साथ ही सन्देश देती है कि पर्यावरण के लिए सभी पेड़ पौधे अनिवार्य होने के साथ-साथ उपयोगी हैं। इस पर्व में महिलाएं प्रतिदिन संध्या काल फूल लोढती है। फूल के साथ साथ विभिन्न पेड़ पौधों का पत्ता भी जमा किया जाता है। इसमें बेली, चमेली, ओड़हुल, गुलाब, कनैल, अपराजिता आदि का फूल और जाही, जूही, बाँस, मेहदी, अमरूद, आवला, अनार, अकौन आदि का पत्ता होता है।

 

इस सबसे डाला भरकर व्रती महिला नित्य संध्या काल में घर लौटती हैं और इस फूल-पत्ते से अगले दिन सुबह पूजा होती है। इस पर्व में बसिया फूल-पत्ते से पूजा करने का विधान है। फूल लोढ़ने के क्रम में नव विवाहिता महिलाओं के बीच पेड़ पौधों के नाम और उसकी उपयोगिता को लेकर चर्च विचर्च किया जाता है। यह क्रम प्रथम दिवस अर्थात मौना पञ्चमी से लेकर अंतिम दिन तक चलता है। पत्ता तोड़ने का विधान भी उस मास में किया गया है जब वर्षा होती है।
साँप को बचाने के लिए दिया जाता है संदेश 
पर्यावरण मे साँप जैसे विषधर प्राणी का भी महत्वपूर्ण स्थान है। आधुनिक विज्ञान भी इसे स्वीकार करता है। कई अनुसन्धान के बाद, लेकिन मिथिला में अनादि काल से लोग इसे जानते हैं। मात्र जानते ही नहीं है अपितु साँप जैसे जीव की रक्षा के लिए विधिवत विधान मधुश्रावणी पर्व में किया गया है। नव विवाहित महिला तिथि के हिसाब से लगातार 14 दिन तक बिसहारा का पूजन करती हैं।
नाग-नागिन से संबंधित अनेको कथा सुनती हैं जो आगामी जीवन में पाथेय का काम करता है। अमर सुहाग की कामना के साथ होने वाली इस पर्व में महिला और उसमे भी नव विवाहिता महिला को जोड़ने के पीछे का कारण भी संभवत: यही है। यह विधान इसलिए किया गया है क्योंकि नव विवाहिता महिला आगे चलकर मां बनती हैं। अगर मां पर्यावरण को लेकर सचेत रहेगी तो आना वाला जेनरेशन भी पर्यावरण को लेकर सदैव सजग रहेगा।
credit- Roshan Kumar MaithilView Profile

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