सोशल मीडिया पर आप दिन भर में काफ़ी कुछ पढ़ते हैं, लेकिन कुछ पढ़ना बहुत अहम हो जाता है। अहम इसलिये कि उसमें से ही एक कहानी आपको काफ़ी कुछ सीखा सकती है और कई बड़ी प्रेरणा दे सकती है। वह आपको सीखाती है कि जब हालात आपके बिल्कुल विपरीत हो तो भी ज़िन्दगी में सबकुछ खत्म नहीं हो जाता। हम वैसी ही एक कहानी लेकर आये हैं।

यह कहानी है पटना की रहने वाली महिमा की जिन्होंने मौत को हराकर उससे अपनी ज़िंदगी जीती। महिमा ने पच्चीस साल की उम्र में पैरालीसिस को हराया। पैरालीसिस से उनके शरीर का पूरा दायाँ भाग निष्क्रिय हो गया था। कहा जाता है कि इससे उबरने का बस एक ही उपाय होता है, और वो है बस आपकी इच्छाशक्ति। महिमा इस स्ट्रोक से लड़ी और फ़िर लड़कर जीती भी।

“पैरालीसिस या सेरेब्रल थ्रॉम्बोसिस तब होता है जब मस्तिष्क के वीनस साइनस में खून का थक्का जम जाता है। यह रक्त को मस्तिष्क से बाहर निकलने से रोकता है। शिराओं और रक्त कोशिकाओं पर दबाव बढ़ जाता है, जिससे सूजन और शिराओं में रक्तस्त्राव होने लगता है।”

मनुष्य में इसके होने की औसत उम्र 39 साल है। इसलिये यह बड़ा अजीब वाक्या था डॉक्टर्स के लिये भी 25 साल की उम्र में महिमा को सेरेबल थ्रोम्बोसिस होना।

अधिकतर मामलों में इसका सबसे बड़ा लक्षण है : सिरदर्द होना। महिमा के साथ भी यही हो रहा था। लेकिन स्ट्रोक के दिन की अपनी असहजता पर बात करते हुए महिमा ने बताया कि मुझे बखूबी याद है कि मेरे शरीर का बांया हिस्सा लगातार फड़फड़ा रहा था और दायां हिस्सा इतना कमजोर पड़ चुका था कि शरीर अपना संतुलन भी नहीं बना पा रहा था और इसका असर स्ट्रेचर पर भी दिख रहा था। छटपट छटपट करते हुए कई बार स्ट्रेचर से भी गिरने की नौबत आ जाती थी। वो पूरा दिन मेरा ग्लूकोस के साथ स्ट्रेचर पर रोमांस करते हुए बिता।

रात तक पापा भी कोलकाता से दिल्ली आ पहुंचे। कुछ विचार विमर्श के बाद मुझे दूसरे हॉस्पिटल में शिफ्ट कर दिया गया था, और ये सब आधी रात को हुआ था। अब तक पता नहीं कर पाया गया था कि आखिर हुआ क्या क्या था मुझे? तीन दिन ICU में रखने के बाद एवं विभिन्न टेस्ट्स कराने के बाद परिवार वालों को बताया गया कि ये सेरिब्रल थ्रोम्बोसिस का केस है, आम बोल चल में मुझे ब्रैनस्ट्रोक आया था जिसके कारण मेरे शरीर का दाहिना हिस्सा पूरा पैरालाइज्ड हो गया था।

डॉक्टर्स के लिये जितना ये केस हैरान करने वाला था उससे कहीं ज़्यादा महिमा को रिकवरी करते देखना रहा। डॉक्टर के अनुसार उन्होंने कभी इतने कम उम्र के इंसान में न तो ये बीमारी देखी और न ही इससे लड़ने की इच्छाशक्ति।

महिमा ने अपने रिकवरी के अनुभव के बारे में बताया कि वह नजारा मुझे आज भी याद है जब मैं हॉस्पिटल में थी, जब मेरी दाहिने हाथ की उँगलियों की हल्की सी मूवमेंट देख मम्मी पापा की आंखों में खुशी के आंसू यूं आए मानो मैंने किसी युद्ध में विजय प्राप्त किया हो। उसी हलके से मूवमेंट के आधार पर मुझे हॉस्पिटल से डिस्चार्ज होने भी दिया गया था और करीब 31 मई तक मैं वॉकर के सहारे अपने पैरों पर खड़ी हो गयी थी। मुझे अच्छे से याद है घर में जश्न का माहौल बन उठा था।

धीरे-धीरे अपनी इच्छाशक्ति से महिमा हर अगले दिन अपने पुराने दिनों के नज़दीक आती रही। महिमा जिस तरह से लड़ी और लड़कर जीती भी यह किसी भी इंसान के लिये बहुत बड़ी प्रेरणा हो सकती है। उन्होंने दुनिया को यह बताया कि आप तब तक हार नहीं सकते जब तक आपका मन न हार जाये। पटना, बिहार और पूरे देश को अपनी इस बेटी पर गर्व है।

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