ये बिहारी लड़का अंग्रेजी नहीं आने पर 21 बार असफल हुआ, फिर अंग्रेजी में लिख दी किताब

एक बिहारी सब पर भारी

कहते हैं कि प्रतिभा किसी की मोहताज नहीं होती। जिसने लगन से जिस चीज़ को चाहा है उसे वह मिल ही जाता है। कुछ ऐसे ही ‘होनवार वीरवान के होते चिकने पात’ की कहावत को चरितार्थ किया है मधुबनी जिले के जयकृष्ण मिश्रा ने। गांव में हिंदी माध्यम से पढ़ाई और संघर्षपूर्ण जीवन के बाद आज बैंक मैनेजर जयकृष्ण मिश्रा अपने अंग्रेजी नॉबेल की वजह से लोगों के बीच मशहूर हो गए।

21 बार इंटरव्यू में फेल होने के बाद उनकी पहली नौकरी 21 इंटरव्यू के बाद कॉल सेंटर में लगी। अपनी मेहनत के साथ यहां तक पंहुचे जयकृष्ण मिश्रा की संघर्ष की कहानी यहीं नहीं रुकी…


ग्रामीण परिवेश में जिंदगी की शुरुआत और सरकारी स्कूल में पढ़ाई के बाद संघर्ष की यह ऐसी कहानी है। जो गांव से शुरू होकर शहर में जाकर रूकती है। यह कहानी मधुबनी जिले के अंधराठाढ़ी प्रखण्ड के नवनगर गांव के रहने वाले जयकृष्ण मिश्रा की है जिन्होंने अपने पैतृक गांव नवनगर से हिंदी मीडियम में पढ़ाई की शुरुआत की थी।
परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होने के कारण उनके पढ़ाई में कई बाधाएं आई। लेकिन पढ़ने की ललक ने उन्हें छात्र उम्र में ही शिक्षक बना दिया। गांव-घर में बच्चों को ट्यूशन पढ़ाते हुए जयकृष्ण मिश्रा ने अपनी दसवीं की पढ़ाई पूरी की।
Image result for job rejectionउसके बाद दरभंगा से आगे की पढ़ाई करते हुए अपने मेहनत के बदौलत उन्होंने डीयू में अपना दाखिला करवा लिया।
दिल्ली से ही आगे की पढ़ाई करते हुए उन्होंने विभिन्न-विभिन्न कंपनियों में इंटरव्यू देना शुरू किया।
लेकिन उन्हें लगातार हर जगह निराशा ही हाथ लगी। 21 बार इंटरव्यू में फेल होने के बाद उनकी पहली नौकरी 21 इंटरव्यू के बाद कॉल सेंटर में लगी। अपनी मेहनत के साथ यहां तक पंहुचे जयकृष्ण मिश्रा की संघर्ष की कहानी यहीं नहीं रुकी।

आगे उन्होंने कॉल सेंटर में नौकरी करते हुए भी अपना पढ़ाई जारी रखा। नौकरी करते हुए विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में भी वह अपना भाग्य आजमाते रहे। नौकरी के क्रम में 10 साल की कड़ी मेहनत के बाद उन्होंने बैंक पीओ की परीक्षा में सफलता हासिल किया।
और आज वो मुम्बई के बैंक ऑफ़ बड़ौदा में बतौर बैंक मैनेजर कार्यरत हैं। जय कृष्ण मिश्रा बताते हैं कि नौकरी की तलाश के क्रम में शुरूआती दौर में उन्हें अक्सर हिंदी मीडियम में पढ़ाई और अंग्रेजी के कमजोर होने के कारण नौकरी नहीं मिली।


लेकिन हमेशा अपने लक्ष्य को आगे रखने वाले जयकृष्ण मिश्रा ने हिंदी मीडियम से पढ़ाई की शुरुआत करने के वाबजूद भी कॉल सेंटर एम्प्लॉय के बाद बैंक मैनेजर और उसके बाद अंग्रेजी नोवेल लिख के एक नई मिसाल पेश की है। यह नोवेल एक इंसान के जन्म से मृत्यु तक के सफर में संघर्ष को बताती है। जयकृष्ण की ये कहानी उन सभी युवाओं के लिए एक प्रेरणा है जो स्थिति के आगे हार मान लेते हैं।

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