बिहार के एक गरीब किसान ने बेटी को डॉक्टर बनाने का सपना देखा, बेटी मेहनत कर बनी एमबीबीएस टॉपर

एक बिहारी सब पर भारी

बेटों को लेकर सपना तो हर कोई देखता है, पर बिहार के एक गरीब किसान ने अपनी बेटी को डॉक्टर बनाने का न केवल सपना संजोया बल्कि उसे सच करने की हर संभव कोशिश की। बेटियों ने भी उनके सपने को साकार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी और आइजीआइएम के एमबीबीएस की टॉपर बनी।

सफलता की ये गाथा है एक साधारण से किसान चंद्रभूषण सिंह की। चंद्रभूषण गांव और देहात में इलाज की सरकारी सुविधा से भली भांति अवगत हैं। उनके परिवार में भी कोई डॉक्टर नहीं था। जब उनकी बेटी ऋतंभरा पैदा हुई तो उन्होंने संकल्प लिया कि अपनी बेटी को हर हाल में डॉक्टर ही बनाएंगे जो गरीबों का मुफ्त इलाज करेगी।

बिहार की राजधानी पटना का दीघा इलाका कुछ साल पहले तक सिर्फ खेती के लिए पहचान जाता था। एक मामूली किसान के लिए यह सब आसान नहीं था। और वो अपनी ये ज़िद्द छोड़ने वालों में से नहीं थे। चंद्रभूषण ने ठान लिया कि उन्नत खेती करेंगे और इतना धन जुटाएंगे जिससे अपने सपने को बेटी के जरिए जी सकें। चंद्रभूषण ने अपने इरादे को मज़बूत करते हुए यहां अपनी छोटी सी जोत पर नकदी फसल की खेती करनी शुरू की। सब्जी की खेती की और तैयार फसल को खुद साइकिल पर लादकर शहर में बेचने को ले जाते। कमाई का पचास प्रतिसत हिस्सा बेटी की डॉक्टरी की पढ़ाई के लिए जमा करते जाते।



बेटी को डॉक्टर बनाने के सपने को पूरा करने में चंद्रभूषण के पिता राम पदारथ सिंह ने भी पूरा साथ दिया। पोती ऋतंभरा को डॉक्टर बनाने के लिए अपने बेटे चंद्रभूषण को हमेशा प्रेरित करते रहे।

चंद्रभूषण सिंह कहते हैं कि महंगी शिक्षा और किसानों की माली हालत उसे बेटी तो छोड़िये, बेटे को भी डॉक्टर बनाने की इज़ाज़त नही देती। पर दृढ़ संकल्प हो तो सब कुछ संभव है।

उन्होंने बताया की बेटी को प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा देने में ज्यादा परेशानी नहीं हुई, लेकिन ऋतंभरा की मेडिकल की महंगी पढ़ाई के लिए कर्ज भी लेना पड़ा। परिवार की आर्थिक स्थिति और ख़राब हो गई, लेकिन पूरा परिवार साथ देने को एकजुट रहा। बेटी को कभी इसका एहसास नहीं होने दिया गया।

चंद्रभूषण सिंह को कई बार लगा की बेटी को डॉक्टर बनाने का उनका संकल्प कहीं अधूरा न रह जाये। डर लगता था की पांच साल की मेडिकल की पढ़ाई पूरी हो पाएगी या नहीं पर साथियों ने हर कदम पर हौसला दिया और सपने को पूरा करने में सहायता की।





पिता के सपने को पूरा करने में ऋतंभरा ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी। मेडिकल की एंट्रेंस परीक्षा में सफलता हासिल कर इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (IGIMS) में दाखिला लिया और कड़ी मेहनत की बदौलत न सिर्फ कई विभागों में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया बल्कि एमबीबीएस में टॉपर भी रहीं।

IGIMS के दीक्षा समारोह में जब ऋतंभरा को सात गोल्ड मेडल दिए जा रहे था, तो पूरा हॉल में तालियों की गडग़ड़ाहट के साथ चंद्रभूषण के लगन और मेहनत की चर्चा चारों ओर गूँज रही थी। और किसान पिता की आँखें ख़ुशी से दबदबा गईं।




इस मौके पर ऋतंभरा ने बताया, ‘मेरी पढाई और मेरा ये जीवन मेरे परिवार और समाज को समर्पित करती हूँ। मैं गांव और देहात घूम-घूमकर गरीबों का मुफ्त इलाज करूंगी। मेरे पिता ने मुझे डॉक्टर बनाने के लिए एक-एक पैसा रात-दिन कड़ी मेहनत कर जमा किया है। सबसे बड़ी बात कि उन्होंने कभी यह नहीं कहा कि पैसे की वजह से वो मेरे लिए किताब या की इंस्ट्रूमेंट नहीं खरीद पाएंगे।’

वहीं चंद्रभूषण ने कहा, ‘लोग बेटी और और बेटे में भेदभाव कर परिवार में समस्या को जन्म देते हैं। कभी भी मैंने अपनी बेटी को बोझ नहीं माना। बेटी और बेटे दोनों ही हमारे संतान होते हैं। दोनों को मैंने बराबर का दर्जा दिया।’

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