क्या बिहार का डीजल इंजन कारखाना होगा बंद? नीतीश कुमार करेंगे रेल मंत्री से बात…

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बिहार के सारण जिले के छपरा में बन रहे रेल डीजल इंजन फैक्ट्री पर बंदी की तलवार लटकी गई है. कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार रेल बोर्ड इसे बंद करने का विचार कर रहा है। रेलवे में इलेक्ट्रीफिकेशन को बढ़ावा देने को ध्यान में रखते हुए सरकार इस फैक्ट्री को बंद कर सकती है.

ये फैक्ट्री बिहार के सारण जिले के मढ़ौरा में रेलवे और अमेरिका की जनरल इलेक्ट्रिक कंपनी (GE) के साथ पार्टनरशिप में शुरू हुई थी. महज दो साल बाद ही इस प्रोजेक्ट को अब बंद करने की खबर है. मढौरा की डीजल रेल फैक्ट्री देश का दूसरा और बिहार का पहला डीजल कारखाना है.

हालांकि, इस संबंध में कोई निर्णय नहीं लिया गया है और ही रेलवे बोर्ड की ओर से कोई आधिकारिक जानकारी ही दी गयी है।

इधर, इस बात के सामने आते ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने रेलमंत्री पीयूष गोयल से बात करने का फैसला किया है।

रेलवे बोर्ड के चेयरमैन अश्वनी लोहानी इस सोच के साथ आगे बढ़ रहे हैं कि रेलवे के विद्युतीकरण में तेजी आए और डीजल की खपत कम हो।

इसी आधार पर मढ़ौरा डीजल इंजन कारखाना को अव्यवहारिक बताया जा रहा है। ऐसी बात तब सामने आई है जबकि आज भी देश के 58 फीसदी रेल ट्रैक डीजल के भरोसे ही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि रेलवे को डीजल इंजन की जरूरत नहीं है और इलेक्ट्रिक इंजन का कारखाना लगाने हैं तो इसी फैक्ट्री को विकसित किया जाए।

इससे रेलवे अपने पूर्व के संसाधनों का प्रयोग भी कर सकेगा और स्थानीय स्तर पर रोजगार के दरवाजे बंद नहीं होंगे। उधर,इस खबर की जानकारी मिलते ही स्थानीय स्तर पर विरोध के स्वर उभरने लगे हैं।

वे मान रहे हैं कि यह मढ़ौरा और बिहार के लिए शुभ नहीं है। मढ़ौरा डीजल इंजन फैक्ट्री लगाना सिर्फ कारोबारी फैसला नहीं था।

यह मढ़ौरा में रहने वाले लाखों लोगों के लिए ऑक्सीजन है। शुगर फैक्ट्री, मॉर्टन फैक्ट्री जब मढ़ौरा में मौजूद थी तो इस रीजन के लोगों के लिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर रोजगार सृजन का सबसे बड़ा केंद्र था।

लेकिन ये दोनों फैक्ट्रियां बंद हो गई और इस रीजन से रोजगार लगभग समाप्त हो गया।

हज़ारों लोग बेरोजगार हुए और लाखों लोगों के दो वक्त की रोटी पर आफत गई। लेकिन जब डीजल इंजन खुला तो उम्मीद एक बार फिर जगी क्योंकि रेलवे का यह प्रोजेक्ट कहीं बड़ा और प्रभावी है।

प्रोजेक्ट को बंद करने के कारण क्या हैं?

इस प्रोजेक्ट को बंद करने का कारण रेलवे नेटवर्क को इलेक्ट्रीफिकेशन की तरफ ले जाना है. मतलब ये है कि आगे आने वाले दिनों में इलेक्ट्रिक इंजन्स का इस्तेमाल किया जाएगा और डीजल इंजन को पूरी तरह से बंद कर दिया जाएगा.

बता दें कि इस प्रोजेक्ट को बंद करने के लिए या इस कॉन्ट्रैक्ट से बाहर आने के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल को आम सहमति की भी जरूरत पड़ेगी.

GE प्रवक्ता ने क्या कहा?

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में GE कंपनी के प्रवक्ता का भी बयान भी है, प्रवक्ता के मुताबिक कंपनी एक हजार डीजल-इलेक्ट्रिक लोकोमोटिव्स को तैयार करने में जुटी है, काम ट्रैक पर है. उन्होंने कहा है कि वो देश में मॉडर्न इंफ्रास्ट्रक्चर और ढेर सारी जॉब्स लाने जा रहे है.

कंपनी ने कहा है कि फिलहाल दो इंजनों का निर्माण और टेस्टिंग किया जा चुका है. पहला लोकोमोटिव जल्द ही भारत पहुंचने वाला है.कंपनी के मुताबिक प्रोजेक्ट का काम तेजी से चल रहा है. हर काम समय से पूरा हो जाएगा.

वहीं रेलवे ऑफिशियल्स के मुताबिक, अंतिम फैसला लिए जाने के पहले सारे नफे नुकसान को देखा जाएगा.

कब शुरू हुआ था कॉन्ट्रेक्ट

रेलवे ने साल 2015 में बिहार के मढ़ौरा में डीजल लोकोमोटिव फैक्ट्री का कॉन्ट्रेक्ट GE कंपनी को दिया था. साथ ही एलस्टॉम कंपनी को इलेक्ट्रिक लोकोमोटिव फैक्ट्री का कॉन्ट्रेक्ट मिला था. इस कार्यक्रम में कई केंद्रीय मंत्री भी शामिल हुए थे, जिनमें वित्त मंत्री अरुण जेटली भी शामिल थे.

बताया जाता है कि मढ़ौरा और मधेपुरा प्रोजेक्ट रेल सेक्टर के सबसे बड़े FDI में से एक हैं, दोनों मिलाकर कुल 40 हजार का इन्वेस्टमेंट हुआ था.

इस प्रोजेक्ट को शुरुआती में काफी अहमियत दी गई थी लेकिन अब मंत्रालय का नया रूख है कि डीजल लोकोमोटिव्स का इस्तेमाल आने वाले दिनों में नहीं होगा, जो बचा हुआ स्टॉक है वो करीब 2 से 3 दशक तक काम आएगा.

राजनीतिक रूप से भी अहम है ये प्रोजेक्ट

बता दें कि सारण जिला बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव का गृह जिला है. वहीं मोदी सरकार के पूर्व मंत्री राजीव प्रताप रूडी इसी जिले के छपरा से सांसद हैं. हाल ही में उन्होंने बयान दिया था कि साल 2019 से इस डीजल रेल कारखाने में प्रोडक्शन शुरू हो जाएगा.

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