बिहार में पुरखों की खेती का तरीका अपनाएंगे किसान, नीतीश सरकार भी चलाएगी अभियान

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बिहार में अब किसान पुरखों की खेती का तरीका फिर से अपना जा रहे हैं। ऐसे में खेती की दशकों पुरानी विधा एक बार फिर जीवंत होगी। नीतीश सरकार ने इसे प्राकृतिक खेती का नाम दिया है। तीन साल तक के लिए 31 हजार हेक्टेयर का लक्ष्य तय किया गया है।  इसके लिए बिहार सरकार अभियान भी चलाएगी। खेती अपनाने वाले किसानों को प्रोत्साहित करने के लिए प्रति एकड़ दो हजार सरकार की ओर से दिया जाएगा।

इस पुरानी विधा में खेत और किसान के घर से निकले उत्पाद के अलावा कुछ नहीं डाला जाएगा। ना तो रासायनिक खाद का प्रयोग होगा ना ही कीटनाशी का। कंपोस्ट का प्रयोग किसान कर सकते हैं, लेकिन बाजार से खरीद कर नहीं। उन्हें अपने पशुओं से मिले गोबर या गोमूत्र का उपयोग खाद और कीटनाशी के रूप में करना होगा। मानव श्रम की लगात के लिए सरकार दो हजार देगी। इसके अलावा इस प्रकार की खेती में कोई और खर्च नहीं होगा। लिहाजा इसे जीरो बजट खेती भी कहा जाएगा।

सरकार का मानना है कि पुरानी विधि में बिना रसायनों के उपयोग से उपज कुछ कम हो सकती है, पर लागत शून्य होने से लाभ में कोई अंतर नहीं होगा। इसके अलावा मिट्टी के स्वास्थ्य व पर्यावरण की रक्षा तो होगी ही कृषि उत्पाद आमजन के स्वास्थ्य के लिए भी लाभदायक होंगे। तीन वर्षों के बाद जब खेती का पहला चक्र पूरा होगा तो उपज भी बढ़ेगी। सरकार जैविक खेती के बाद प्राकृतिक खेती की शुरुआत करने जा रही है। इसी खरीफ मौसम से इसकी शुरुआत होगी।

पहले चरण में दियारा को प्राथमिकता दी गई है। इन इलाकों में किसान सब्जी के साथ दूसरी फसलों की खेती में कोई खाद का प्रयोग नहीं करते हैं। फसल डूबने के भय से कोई पूंजी नहीं लगाते हैं। उन्हीं किसानों को इसका विस्तार करने को प्रोत्साहित किया जाएगा। खेती की यह विधा जैविक कॉरिडोर की तरह ही है पर इसमें कोई उपादान खरीद कर नहीं लगाना है। बीज से लेकर कंपोस्ट तक घर और खेत से लेना है। इस विधा में प्रमाणीकरण की कोई व्यवस्था नहीं है।

पुरानी विधि समय की मांग
कृषि विभाग में जिला कृषि पदाधिकारी पद से अवकाशप्राप्त करने वाले राम सुहाग सिंह का कहना है कि खेती की पुरानी विधि समय की मांग है। अगर इसे नहीं अपनाया गया तो मिट्टी में उर्वरा शक्ति नहीं बचेगी। पुरानी विधि अपनाने से उत्पादन भी कम नहीं होगा। यह केवल संशय है। आज फसलों की ऐसी किस्में आ गई हैं, जो पहले से दूनी उपज देती हैं।

खत्म हो गई है मिट्टी की ताकत


रोहतास जिले के बडकागांव रकिसया के 75 वर्षीय किसान रामनरेश पांडे का कहना है कि खेती की पुरानी विधि स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभदायक थी। पहले के अनाज में ताकत होती थी। आज तो सिर्फ पेट भरने के लिए अनाज उपजाते हैं। हालांकि अब बिना खाद और कीटनाशी के खेती कठिन है। मिट्टी की ताकत भी खत्म हो गई है। लेकिन, कुछ दिन इस प्रकार से खेती होती रही तो फिर से मिट्टी की सेहत ठीक हो जाएगी।

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