अपनी संस्कृति, पहनावा और खानपान से है बिहार की अलग पहचान

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बिहार की हजारों वर्ष प्राचीन परम्पराएं आज भी हैं जीवित
बिहार भारतीय संस्कृति का केंद्र रहा है। यहां की संस्कृति, इतिहास और सभ्यता काफी समृद्ध है। बिहार की परम्परा यहां के लोगों के खून में बस्ती है। बिहारी सभ्यता व संस्कृति की जड़ें इतनी गहरी हैं कि तकनीकी बदलाव के बावजूद हजारों वर्ष पुरानी परम्पराएं आज भी जीवित हैं। बिहार की संस्कृति भोजपुरी, मैथिली, मगही, तिरहुत समेत अन्य संस्कृतियों का मिश्रण है। नगरों और गांवों की संस्कृति में खास फर्क नहीं है। नगरों में भी लोग पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन करते हैं, साथ ही उनकी मान्यताएं रूढ़िवादी हैं। बिहारी समाज पुरूष प्रधान है, यहां महिलाओं-लड़कियों को नियंत्रण में रखा जाता है। बिहार में हिंदू और मुस्लिम आपसी सहिष्णुता का परिचय देते हैं। लेकिन, कई अवसरों पर यह तनाव का रूप भी ले लेता है। दोनों समुदायों में विवाह को छोड़कर सामाजिक और पारिवारिक मूल्य लगभग समान है।

जैन व बौद्ध धर्म की जन्मस्थली होने के बावजूद यहां दोनों धर्मों के अनुयाईयों की संख्या कम है। हालांकि, पटना सहित अन्य शहरों में सिक्ख धर्मावलंबी अच्छी संख्या में हैं। यहां के प्रमुख पर्व-त्योहारों में छठ, होली, दीपावली, दशहरा, महाशिवरात्रि, नागपंचमी, श्री पंचमी, मुहर्रम, ईद व क्रिसमस हैं। सिक्खों के दसवें गुरु गोबिन्द सिंह जी का जन्म स्थान होने के कारण पटना में उनकी जयन्ती पर भी भारी श्रद्धार्पण देखने को मिलता है। बिहार में शादी-विवाह के दौरान ही प्रदेश की सांस्कृतिक प्रचुरता स्पष्ट होती है। जातिगत आग्रह के कारण शत-प्रतिशत शादियां माता-पिता या रिश्तेदारों द्वारा तय परिवार में ही होती हैं। शादी में बारात और जश्न की सीमा आर्थिक स्थिति पर निर्भर करती है। लगभग सभी जातियों में दहेज़ का चलन महामारी के रूप में व्याप्त है। दहेज के लिए विवाह का टूटना या बहू की प्रताड़ना समाचार की सुर्खियां बनती हैं। लोकगीतों के गायन का प्रचलन लगभग सभी समुदायों में हैं। आधुनिक व पुराने संगीत भी इन समारोहों में सुनाई देते हैं। शादी के दौरान शहनाई का बजना आम बात है। इस वाद्ययंत्र को लोकप्रिय बनाने में बिस्मिल्ला खान का नाम सर्वोपरि है, जिनका जन्म बिहार में ही हुआ था।



पारम्परिक वेशभूषा जो बढ़ाती हैं बिहार की शान

अन्य राज्यों की तरह बिहार की भी अपनी पारंपरिक वेशभूषा है। बात चाहे दरभंगा, गया की करें या अन्य जिले की, यहां के लोगों द्वारा खास मौकों पर पहने जाने वाले पारंपरिक परिधान हमेशा आकर्षक लगते हैं। देशभर में तेजी से फैलते पश्चिमी तौर-तरीकों से जुड़े पहनावे के बावजूद बिहार की अपनी पारंपरिक वेशभूषा का कोई जवाब नहीं है। यहां पर्व-त्योहारों में लोग अपनी पारंपरिक वेशभूषा में रहना पसंद करते हैं। भाई-बहन का प्रसिद्ध त्योहार ‘रक्षाबंधन’ व ‘भाईदूज’ में बहने आमतौर पर ‘लहंगे’ में नजर आती हैं। वहीं, भाई ‘पायजामा-कुर्ता’ या ‘धोती-कुर्ता’ में नजर आते हैं। लोक आस्था का महापर्व ‘छठ’ में महिला व्रती ‘चुनरी साड़ी’ पहनती हैं। हालांकि, पुरुष व्रती ‘धोती व बनियान’ पहनकर छठ माता की आराधना करते हैं। सुहागनों का प्रमुख त्योहार ‘तीज’ में महिलाएं अपने हाथों में मेहंदी जरूर लगवाती हैं। चाहे दीपावली का त्योहार हो चाहे होली का लोग अपनी पारंपरिक वेशभूषा में ही नजर आते हैं। शादी-ब्याह में तो यहां कि महिलाओं और पुरूषों का पहनावा देखते ही बनता है। महिलाएं किस्म -किस्म के गहने पहनकर बेहद ही खूबसूरत नजर आती हैं। कानों में ‘बाली’, ललाट पर ‘बिंदी’, दोनों हाथों में ‘चुड़ियां’ व पांव में पायल और बिछिया महिलाओं की सुंदरता में चार चांद लगा देते हैं। अपने आप को आकर्षक दिखाने के लिए पुरुष भी पीछे नहीं रहते हैं। चुड़ीदार पायजामा व कुर्ता पहन कर कपड़ों पर किस्म-किस्म के सुगंधित इत्र व सेन्ट लगाते हैं। दूसरी ओर, ग्रामीण इलाकों की महिलाएं अपनी बांह या कलाई पर टैटू लगवाती हैं, जिसे आम बोलचाल की भाषा में ‘गोदना या गुदवाना’ कहा जाता है। पटना व गया जिले के ग्रामीण इलाकों के लोग अपने माथे पर ‘पगड़ी’ व कानों में ‘कुंडल’ पहन कर बेहद ही पारंपरिक नजर आते हैं।

‘पाग’ व धोती-कुर्ता के साथ गमछा, मिथिलांचल की है खास पहचान

मिथिलांचल की पहचान वहां के परिधानों से होती है। वहां के पहनावे लोगों को खूब भाते हैं। उनके पहनावे में सिर पर ‘पाग’ व धोती-कुर्ता के साथ गमछा भी शामिल रहता है। मिथिलांचल में शादी की रस्म के दौरान वर को धोती-कुर्ता पहनाने का प्राचीन रिवाज रहा है। वहां के युवक बारात निकलने के समय भले ही शेरवानी व कोर्ट-पैंट पहनते हों, लेकिन जब वे शादी के मंडप में पहुंचते हैं तब वह पारंपरिक धोती-कुर्ता ही पहनते हैं। मिथिलांचल के बेहद ही आकर्षक वेशभूषा की झलक मशहूर मिथिला पेंटिंग में भी नजर आती है।

लिट्टी-चोखा है मशहूर व्यंजन
बिहार अपने खानपान की विविधता के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ के लोग शाकाहार व मांसाहार दोनो व्यंजन पसंद करते हैं। मिठाईयों की विभिन्न किस्मों के अलावे अनरसा की गोली, खाजा, मोतीचूर का लड्डू, तिलकुट, खुरमा यहां की खास पसंद है। सत्तू, चूड़ा-दही और लिट्टी-चोखा जैसे स्थानीय व्यंजन तो यहां के लोगों की कमजोरी है। लहसून की चटनी भी बहुत पसंद की जाती है। लालू प्रसाद के रेल मंत्री बनने के बाद से लिट्टी-चोखा भारतीय रेल के महत्वपूर्ण स्टेशनों पर भी मिलने लगा है। सुबह के नास्ते मे चूड़ा-दही या पुड़ी-जलेबी खूब खाये जाते हैं। दिन में चावल-दाल-सब्जी और रात में रोटी-सब्जी यहाँ का सामान्य भोजन है।



खेलकूद व गीत-संगीत से होते हैं मनोरंजन

भारत के कई जगहों की तरह क्रिकेट बिहार में भी सर्वाधिक लोकप्रिय है। इसके अलावा फुटबॉल, हाकी, टेनिस और गोल्फ भी पसन्द किया जाता है। बिहार का अधिकांश हिस्सा ग्रामीण है। इस कारण पारंपरिक भारतीय खेल जैसे कबड्डी, गिल्ली-डंडा, पिट्टो, गुल्ली (कंचे) बहुत लोकप्रिय हैं। बिहार के शहर, कस्बों और गांवों में फिल्मों की लोकप्रियता बहुत अधिक है। यहां हिंदी फिल्मों के संगीत बहुत पसन्द किये जाते हैं। मुख्य धारा की हिन्दी फिल्मों के अलावा भोजपुरी फिल्मों ने भी अपना प्रभुत्व जमाया है। मैथिली व अन्य स्थानीय सिनेमा भी लोकप्रिय हैं। अंग्रेजी फिल्म पटना जैसे नगरों में ही देखे जाते हैं। वहीं, कुछ लोग नृत्य, नाटकीय मंचन या चित्रकला में भी अपना योगदान देना पसंद करते हैं। अशिक्षित या अर्धशिक्षित लोग ताश या जुए खेलकर अपना समय काटते हैं।

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