New Delhi: देश में पेड़ो की कटाई वातावरण और सरकार के लिए एक बड़ी समस्या बन गई है। लेकिन बिहार का हरपुर बोचहा गाँव इस बात का उदाहरण है कि समुदाय की भागीदारी चीजों को कैसे बेहतर बना सकती है।

कभी बाढ़ और सूखे के कारण तबाह होने वाला, समस्तीपुर जिले का गाँव आज राष्ट्रीय स्तर पर अपने हरे भरे विस्तार के लिए पहचाना जाता है। इतना ही नहीं इसे ‘पंचायत सशक्तीकरण पुरस्कार’ के रूप में इसके पुनर्विकास के प्रयासों की सराहना सरकार ने भी की है।

ग्राम पंचायत के मुखिया प्रेम शंकर सिंह इस परिवर्तन का नेतृत्व करने वाले इंसान हैं। “हमारा गाँव बाढ़ और सूखे की पुनरावृत्ति के दौरान अपने पेड़ों को बहुत तेजी से खो रहा था। जब मैं पहली बार 2001 में पंचायत प्रधान बना था, तब यहां बहुत कम पेड़ बचे थे। सिंह ने आईएएनएस को बताया कि यह उन किसानों के लिए बदतर था, जिनके लिए खेती करना मुश्किल हो गया था, क्योंकि गांव की भूमि बर्बाद हो चुकी थी।

सिंह ने चुनौती का सामना किया। उन्होंने तीन बड़े तालाबों का निर्माण किया। जिसका उपयोग 3,000 एकड़ भूमि में पानी की आपूर्ति के लिए किया गया। 3 किलोमीटर लंबी नहर का निर्माण खेतों में पानी लाने के लिए किया गया।

प्रयासों ने फलस्वरुप भूमि धीरे-धीरे पुनर्जीवित हो गई। हरपुर बोचहा में आज 17,000 से अधिक पेड़ हैं। सबसे अधिक फल देने वाले और दर्जनों तालाब हैं। इस गांब को राष्ट्रीय हरित पंचायत पुरस्कार के लिए चुना गया है। दरअसल, पंचायत के अंतर्गत आने वाले हर एक गांव में दर्जनों तालाब हैं।

जहां फलदार पेड़ ग्रामीणों को एक अतिरिक्त आय प्रदान करते हैं, वहीं मछली और मुर्गी पालन भी 10 एकड़ की बंजर भूमि पर बनाए गए तालाब में किया जाता है। सिंह ने कहा कि गाँव की प्रति व्यक्ति आय 552 रुपये से बढ़कर 1,664 रुपये हो गई है। उन्होंने यह भी दावा किया कि गाँव की 11,500 आबादी में साक्षरता 2001 में 46 प्रतिशत से बढ़कर 65 प्रतिशत हो गई है।

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